Empowering Tribal Lives: बदल रही पहाड़ी कोरवा परिवारों की जिंदगी!

Empowering Tribal Lives: छत्तीसगढ़ के सुदूर और वनांचलों में रहने वाले जनजातीय समुदायों के जीवन में इन दिनों एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार द्वारा संचालित विशेष अभियान “जन भागीदारी : सबसे दूर, सबसे पहले” के तहत आयोजित किए जा रहे ‘जनजातीय गरिमा उत्सव शिविर’ आज हाशिए पर खड़े आदिवासी परिवारों के लिए उम्मीद की नई किरण बन चुके हैं। यह अभियान न केवल शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं को अंतिम छोर के व्यक्ति तक पहुंचा रहा है, बल्कि उनके जीवन स्तर को सुधारने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

बलरामपुर जिले के विकासखंड राजपुर के अंतर्गत ग्राम पंचायत पतरापारा की रहने वाली पहाड़ी कोरवा महिला श्रीमती रोन्ही इस बदलाव की एक जीवंत और प्रेरणादायक मिसाल बनकर सामने आई हैं।

बदल रही हैं स्वास्थ्य सुविधाएं

एक विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) से आने वाली श्रीमती रोन्ही का जीवन हमेशा से संघर्षों से भरा रहा है। आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवार से ताल्लुक रखने के कारण वे लंबे समय से विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और शारीरिक तकलीफों से जूझ रही थीं। छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचलों में सीमित संसाधनों और सही स्वास्थ्य जानकारियों के अभाव में, उन्हें छोटी से छोटी बीमारी के इलाज के लिए भी भारी मानसिक और शारीरिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।

अस्पतालों की दूरी और इलाज पर होने वाले भारी-भरकम खर्च के डर से, कई बार वे और उनका परिवार पारंपरिक तौर-तरीकों या स्थानीय बैगा-गुनिया (पारंपरिक उपचारकों) पर निर्भर रहने को मजबूर हो जाते थे। जब भी बीमारी गंभीर रूप लेती थी, तब अस्पताल तक पहुंचना, महंगी दवाइयों का खर्च उठाना और उचित इलाज कराना पूरे परिवार के लिए एक बड़ा आर्थिक संकट और मानसिक बोझ बन जाता था।

‘जनजातीय गरिमा उत्सव’

श्रीमती रोन्ही के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उनके क्षेत्र में ‘जनजातीय गरिमा उत्सव शिविर’ का आयोजन किया गया। इस शिविर में जब वे अपनी समस्याओं को लेकर पहुंचीं, तो वहां मौजूद स्वास्थ्य विभाग की टीम ने संवेदनशीलता दिखाते हुए त्वरित कार्रवाई की। शिविर में ही उनका डेटा प्रोसेस कर तत्काल आयुष्मान कार्ड बनाकर उन्हें सौंप दिया गया।

यह महज एक प्लास्टिक का कार्ड नहीं था, बल्कि रोन्ही और उनके परिवार के लिए मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण इलाज की एक पक्की गारंटी थी। आयुष्मान कार्ड हाथ में आते ही उनके चेहरे पर छाई चिंता की लकीरें सुकून में बदल गईं। अब उन्हें किसी भी बीमारी की स्थिति में पैसों की तंगी या इलाज न मिल पाने का कोई डर नहीं है।

बेहतर कल का भरोसा

अपने अनुभवों को साझा करते हुए श्रीमती रोन्ही बताती हैं कि पहले परिवार में किसी के भी बीमार होने की खबर सुनते ही दिल में एक अनजाना डर और आर्थिक चिंता बैठ जाती थी। मजदूरी से होने वाली सीमित आय में इलाज का खर्च निकालना असंभव सा लगता था। लेकिन अब आयुष्मान कार्ड बन जाने से उन्हें और उनके पूरे परिवार को एक मजबूत सामाजिक और स्वास्थ्य सुरक्षा का अहसास हुआ है।

“इस योजना की बदौलत अब मेरा परिवार भविष्य को लेकर पहले की तुलना में कहीं अधिक निश्चिंत और सुरक्षित महसूस कर रहा है। समय पर सही अस्पताल में मुफ्त इलाज मिलना हमारे जैसे गरीब परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।” – श्रीमती रोन्ही

उन्होंने इस जमीनी पहल के लिए शासन और प्रशासन की संवेदनशीलता की खुले दिल से सराहना की और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।

‘सबसे दूर, सबसे पहले’

धरातल पर उतरती सुशासन की परिकल्पना

श्रीमती रोन्ही की यह कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि कैसे सही नीतियां और लक्षित अभियान अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति का जीवन बदल सकते हैं। ‘जन भागीदारी : सबसे दूर, सबसे पहले’ अभियान वास्तव में अपने नाम को सार्थक कर रहा है।

इन शिविरों के माध्यम से छत्तीसगढ़ के सुदूरतम वनांचलों, पहाड़ों और दूरस्थ गांवों में रहने वाले विशेष रूप से पिछड़ी जनजातियों तक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ पारदर्शी और प्रभावी तरीके से पहुंच रहा है। यह जमीनी प्रयास न केवल जनजातीय समाज को मुख्यधारा से जोड़ रहे हैं, बल्कि उन्हें एक गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार भी दे रहे हैं।

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Rishita Diwan

Content Writer

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