छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में बदलाव की एक नई तस्वीर सामने आ रही है। जिन हाथों में कभी बंदूक और हिंसा का रास्ता था, वही हाथ अब हुनर, मेहनत और रोजगार के जरिए अपने भविष्य को संवारने में जुटे हैं। आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास और कौशल विकास की पहल ने कई युवाओं को न सिर्फ समाज की मुख्यधारा से जोड़ा है, बल्कि उन्हें सम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन जीने का अवसर भी दिया है।
सुकमा जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में यह बदलाव केवल सुरक्षा के नजरिए से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सामाजिक पुनर्निर्माण और विकास की दिशा में भी एक अहम कदम माना जा रहा है। सरकार की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पित युवाओं को प्रशिक्षण, रोजगार और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
बंदूक से रोजगार तक बदली जिंदगी की दिशा
लंबे समय तक बस्तर के कई इलाकों में हिंसा और नक्सल गतिविधियों के कारण सामान्य जनजीवन प्रभावित रहा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच भी चुनौतीपूर्ण रही। ऐसे वातावरण में हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने वाले युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल उनके भविष्य और सम्मानजनक जीवन का होता है।
पुनर्वास कार्यक्रम इसी चुनौती का समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं को केवल सुरक्षा और आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि उन्हें कौशल प्रशिक्षण और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जा रहा है।
कौशल विकास से आत्मनिर्भर बनने की राह
सुकमा में आत्मसमर्पित युवाओं को विभिन्न रोजगारपरक गतिविधियों से जोड़ने की पहल की गई है। हाल ही में जिला प्रशासन और एसबीआई आरसेटी के सहयोग से आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री जैसे रोजगारपरक कौशल का प्रशिक्षण दिए जाने की जानकारी सामने आई है। इस प्रशिक्षण में महिलाएं भी शामिल हैं।
इस तरह की पहल का उद्देश्य स्पष्ट है—आत्मसमर्पित युवाओं को ऐसा हुनर दिया जाए, जिससे वे अपने परिवार की जिम्मेदारी उठा सकें और समाज में अपनी नई पहचान बना सकें।
महिलाओं के लिए भी खुल रहे आत्मनिर्भरता के रास्ते
पुनर्वास की यह प्रक्रिया महिलाओं के लिए भी नई संभावनाएं लेकर आई है। सुकमा के तुंगल इको-पर्यटन केंद्र में संचालित तुंगल नेचर कैफे इसका एक उदाहरण है। यहां आत्मसमर्पण करने वाली और नक्सल हिंसा से प्रभावित महिलाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ा गया है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार, कैफे का संचालन ‘आत्मसमर्पण पुनर्वास महिला स्वयं सहायता समूह’ की 10 महिलाएं कर रही हैं। इनमें पांच महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने नक्सलवाद का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया है, जबकि पांच महिलाएं नक्सल हिंसा से प्रभावित रही हैं।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जुड़ने के साथ-साथ आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान भी मिल रहा है।
पुनर्वास का मतलब सिर्फ आत्मसमर्पण नहीं, नई जिंदगी की शुरुआत
किसी भी हिंसक गतिविधि से बाहर निकलना केवल हथियार छोड़ने तक सीमित नहीं होता। उसके बाद व्यक्ति को सुरक्षित वातावरण, रोजगार, सामाजिक स्वीकार्यता और भविष्य की उम्मीद की जरूरत होती है।
इसी सोच के साथ छत्तीसगढ़ में पुनर्वास आधारित पहल को आगे बढ़ाया जा रहा है। सरकार की ‘पूना मारगेम’ जैसी पहल का उद्देश्य आत्मसमर्पित लोगों को पुनर्वास के माध्यम से फिर से समाज और विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है। फरवरी 2026 में दक्षिण बस्तर के बीजापुर और सुकमा में 51 माओवादी कैडरों के आत्मसमर्पण की जानकारी भी सामने आई थी।
जब बंदूक की जगह हाथों में आए औजार
सुकमा के पुनर्वास केंद्रों में आत्मसमर्पित युवाओं को विभिन्न प्रकार के कौशल से जोड़ने की कोशिशें लगातार सामने आ रही हैं। राजमिस्त्री प्रशिक्षण से लेकर हस्तशिल्प, स्वरोजगार और पर्यटन आधारित गतिविधियों तक, उद्देश्य यही है कि इन युवाओं को स्थायी आजीविका का रास्ता मिले।
पहले जिन हाथों में हथियार थे, उन्हीं हाथों में अब निर्माण के औजार और रोजगार के साधन दिखाई देना बदलाव का बड़ा संकेत है। पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिए जाने की पहल को इसी बदलाव के उदाहरण के तौर पर देखा गया है।
पक्के घर और सरकारी योजनाओं से मजबूत हो रहा भरोसा
पुनर्वासित लोगों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने का असर उनके व्यक्तिगत जीवन में भी दिखाई दे रहा है। सुकमा में आत्मसमर्पित बण्डो राकेश उर्फ जोगेन्द्र को प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत पक्का मकान मिलने की जानकारी सामने आई है। वर्ष 2016 में आत्मसमर्पण करने के बाद उन्होंने मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया था। अब पक्का मकान उनके परिवार के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन का आधार बन रहा है।
इस तरह की योजनाएं पुनर्वास की प्रक्रिया को सिर्फ आर्थिक सहायता से आगे ले जाकर सामाजिक सुरक्षा और स्थायित्व से जोड़ती हैं।
बदल रहा है बस्तर, लौट रहा है विश्वास
बस्तर में बदलाव की तस्वीर अब केवल सरकारी दावों तक सीमित नहीं दिखाई देती। सड़क, बिजली, संचार, शिक्षा, पर्यटन और रोजगार के क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियों के साथ उन लोगों की जिंदगी भी बदल रही है, जो कभी हिंसा के चक्र में फंसे हुए थे।
तुंगल नेचर कैफे जैसी पहल इस बदलाव को जमीनी स्तर पर दिखाती है। यहां कभी बंदूक उठाने वाली महिलाएं आज पर्यटकों का स्वागत कर रही हैं और अपने श्रम से आय अर्जित कर रही हैं। यह कहानी बताती है कि अवसर, विश्वास और सम्मान मिले तो जिंदगी की दिशा बदली जा सकती है।

