प्रेम को परिभाषित करना शायद उतना ही कठिन है, जितना जीवन को कुछ शब्दों में समेटना। क्योंकि प्रेम कोई एक भावना नहीं, बल्कि अनुभूतियों का एक पूरा संसार है। कभी यह किसी की मौजूदगी में चेहरे पर आई मुस्कान होता है, तो कभी किसी की ख़ामोशी में छिपी अनकही बातों को समझ लेने का हुनर।
मेरे लिए प्रेम सिर्फ किसी को चाहना या किसी के साथ होना नहीं है। प्रेम दरअसल वह अवस्था है, जहाँ किसी दूसरे के होने से जीवन थोड़ा और खूबसूरत लगने लगता है। जहाँ हम केवल किसी को समझने की कोशिश नहीं करते, बल्कि उसे महसूस करना भी सीखते हैं।
शायद इसीलिए प्रेम को इबादत कहा गया है। क्योंकि प्रेम में धीरे-धीरे पाने की इच्छा से अधिक देने का भाव विकसित होने लगता है। अधिकार की जगह विश्वास ले लेता है और अपेक्षाओं की जगह स्वीकार्यता। प्रेम हमें यह सिखाता है कि किसी को अपना बनाने से कहीं अधिक खूबसूरत है उसे उसकी पूरी स्वतंत्रता और मौलिकता के साथ स्वीकार करना।
प्रेम – एक पक्ष बहुत सुंदर , दूसरा संवेदनशील
प्रेम का एक पक्ष बहुत सुंदर है और दूसरा उतना ही संवेदनशील। हर प्रेम को उसकी मंज़िल मिले, यह ज़रूरी नहीं। कुछ रिश्ते जीवन भर साथ चलते हैं, कुछ केवल कुछ दूरियों तक साथ निभाते हैं और कुछ ऐसे होते हैं, जो जीवन में उपस्थित न होकर भी हमारी स्मृतियों और संवेदनाओं का हिस्सा बने रहते हैं। लेकिन क्या किसी रिश्ते की सार्थकता केवल उसके साथ बने रहने से तय होती है? शायद नहीं। कुछ एहसास अधूरे रहकर भी हमारे भीतर बहुत कुछ पूरा कर जाते हैं।
प्रेम का सौंदर्य शायद इसी में है कि वह हमें अपने भीतर की दुनिया से परिचित कराता है। किसी की एक मुस्कान पूरे दिन की थकान मिटा सकती है और किसी की उदासी हमारे भीतर भी एक बेचैनी पैदा कर सकती है। फिर प्रकृति भी कुछ अलग दिखाई देने लगती है। बारिश की बूँदों में एक एहसास, चाँदनी में एक कहानी और हवाओं में किसी की याद महसूस होने लगती है। जीवन की साधारण-सी चीज़ें भी असाधारण लगने लगती हैं।
प्रेम – केवल दो लोगों के रोमांटिक रिश्ते तक सीमित नहीं
लेकिन प्रेम को केवल दो लोगों के बीच के रोमांटिक रिश्ते तक सीमित कर देना, शायद उसकी विशालता को कम कर देना है। प्रेम किसी एक रिश्ते, किसी एक व्यक्ति या किसी एक परिभाषा का मोहताज नहीं है। प्रेम हमारे माता-पिता के प्रति हमारी संवेदनाओं में है, भाई-बहनों के साथ साझा किए गए अपनत्व में है, दोस्तों के साथ बिताए गए बेफिक्र पलों में है और पति-पत्नी के रिश्ते में विकसित होने वाले विश्वास और समर्पण में भी है। प्रेम अपने काम के प्रति जुनून में है, अपने सपनों के प्रति प्रतिबद्धता में है और सबसे महत्वपूर्ण, स्वयं के प्रति उस स्वीकार्यता में है, जिसे हम अक्सर दूसरों से प्रेम करते हुए भूल जाते हैं। समाज और साहित्य में प्रेम की चर्चा अक्सर रोमांटिक प्रेम के संदर्भ में अधिक होती है, लेकिन प्रेम का संसार उससे कहीं अधिक विस्तृत है। इसमें रिश्ते भी हैं, जिम्मेदारियाँ भी, संवेदनाएँ भी और स्वयं से जुड़ने की यात्रा भी। प्रेम किसी एक व्यक्ति विशेष का नाम नहीं, बल्कि वह भाव है जो हमारे जीवन के हर उस हिस्से में मौजूद हो सकता है, जहाँ अपनापन, सम्मान, करुणा और जुड़ाव है। शायद प्रेम की सबसे खूबसूरत बात यही है कि वह किसी एक रिश्ते में सिमटता नहीं, बल्कि हर रिश्ते को अपनी-अपनी तरह से अर्थ देता है।
लेकिन प्रेम केवल खूबसूरत एहसासों का नाम नहीं है। इसमें धैर्य है, संवाद है, विश्वास है और सबसे बढ़कर एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील होने की क्षमता है। किसी के साथ बैठकर घंटों बातें करना प्रेम हो सकता है, लेकिन बिना कुछ कहे उसकी ख़ामोशी समझ लेना भी प्रेम है। किसी की खुशी में शामिल होना प्रेम है, लेकिन उसके कठिन समय में बिना किसी शर्त के उसके साथ खड़े रहना प्रेम का और गहरा रूप है।
एक वृक्ष की तरह है प्रेम!
प्रेम को मैं एक वृक्ष की तरह देखती हूँ। जिसकी जड़ें विश्वास में होती हैं, तना सम्मान का होता है और शाखाएँ अपनत्व की। इसे समय, संवाद और संवेदनाओं से सींचना पड़ता है। केवल आकर्षण से कोई रिश्ता लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। उसे जीवित रखता है एक-दूसरे के प्रति वह भाव, जिसमें हम बिना कहे भी एक-दूसरे की परवाह करते हैं।
और फिर प्रेम का एक आध्यात्मिक पक्ष भी है, जिसे शायद शब्दों में पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। जब प्रेम किसी एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर जीवन के प्रति दृष्टिकोण बन जाता है, तब उसका विस्तार होने लगता है। वह प्रकृति के प्रति संवेदना में दिखाई देता है, किसी अनजान व्यक्ति के प्रति करुणा में दिखाई देता है और बिना किसी अपेक्षा के किसी के लिए कुछ कर गुजरने के भाव में दिखाई देता है।
शायद प्रेम की यही यात्रा हमें स्वयं से भी जोड़ती है। क्योंकि जो व्यक्ति प्रेम करना जानता है, वह धीरे-धीरे अपने भीतर की कठोरता, अहंकार और पूर्वाग्रहों को भी पहचानने लगता है। प्रेम हमें बेहतर इंसान बनने की संभावना देता है।
और अंततः, प्रेम का अर्थ हमेशा किसी को पा लेना नहीं होता। कभी प्रेम साथ चलने का नाम है, कभी किसी को उसकी राह चुनने की स्वतंत्रता देने का और कभी दूर रहकर भी उसके लिए मन में सम्मान और शुभकामना बनाए रखने का।
मेरा मानना है कि प्रेम जीवन की सबसे सुंदर साधनाओं में से एक है। इसमें समर्पण भी है, स्वतंत्रता भी; निकटता भी है और एक-दूसरे के अस्तित्व का सम्मान भी। क्योंकि प्रेम का अंतिम उद्देश्य किसी दूसरे व्यक्ति में खो जाना नहीं, बल्कि उसके साथ रहते हुए अपने भीतर के बेहतर इंसान को खोज लेना है।
शायद इसी का नाम प्रेम है—एक ऐसा एहसास, जो किसी एक रिश्ते से शुरू होकर पूरी ज़िंदगी को छू लेता है।
प्रेम केवल किसी को चाहने की कहानी नहीं, बल्कि जीवन को और अधिक संवेदनशील, सुंदर और अर्थपूर्ण बना देने की कला है।
– डॉ. कीर्ति सिसोदिया

