अबूझमाड़ का अरक चावल: जंगलों से छत्तीसगढ़ विधानसभा तक पहुँची सदियों पुरानी खुशबू, जानिए क्यों है यह खास

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले का अबूझमाड़ वर्षों तक अपनी भौगोलिक दुर्गमता और रहस्यमयी पहचान के कारण चर्चा में रहा। लेकिन अब यही इलाका अपनी एक ऐसी खाद्य विरासत की वजह से सुर्खियां बटोर रहा है, जिसकी खुशबू जंगलों की मिट्टी से निकलकर सीधे छत्तीसगढ़ विधानसभा तक पहुंच गई।

हाल ही में छत्तीसगढ़ विधानसभा परिसर में आयोजित पारंपरिक खाद्य प्रदर्शनी में जब अबूझमाड़ का अरक (अरवा) चावल परोसा गया, तो उसकी भीनी-भीनी सुगंध और उससे बनी खीर ने मंत्रियों, विधायकों और अतिथियों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। कई जनप्रतिनिधियों ने इसे छत्तीसगढ़ की पारंपरिक खाद्य विरासत का अनमोल हिस्सा बताया।

आखिर क्या है अरक या अरवा चावल?

अरक, जिसे कई क्षेत्रों में अरवा चावल भी कहा जाता है, ऐसा चावल है जिसे धान को बिना उबाले सीधे कुटाई या मिलिंग करके तैयार किया जाता है। इसके विपरीत उसना चावल में धान को पहले भाप या गर्म पानी में पकाया जाता है और फिर सुखाकर उसकी मिलिंग की जाती है।

यही कारण है कि अरवा चावल अपनी प्राकृतिक सुगंध, मुलायम बनावट और जल्दी पकने की क्षमता के लिए जाना जाता है। पकने के दौरान इसकी खुशबू पूरे घर में फैल जाती है और यही इसकी सबसे बड़ी पहचान मानी जाती है।

सदियों पुरानी परंपरा का स्वाद

अबूझमाड़ के आदिवासी समुदायों के लिए यह केवल भोजन नहीं बल्कि उनकी जीवनशैली का हिस्सा है। यहां के किसान पीढ़ियों से स्थानीय धान किस्मों को संजोकर खेती करते आ रहे हैं। आधुनिक संकर बीजों के बढ़ते चलन के बावजूद कई परिवार आज भी पारंपरिक बीजों और स्थानीय कृषि ज्ञान पर भरोसा करते हैं।

इन्हीं पारंपरिक धानों से तैयार होने वाला अरक चावल स्थानीय त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और विशेष अवसरों पर प्रमुखता से बनाया जाता है।

जब विधानसभा में महकी जंगलों की खुशबू

खाद्य प्रदर्शनी में अरक चावल से बनी खीर सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र रही। हल्के पीले रंग, प्राकृतिक सुगंध और अलग स्वाद वाली इस खीर को चखने के बाद कई अतिथियों ने इसकी सराहना की।

यह आयोजन केवल भोजन का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह संदेश भी था कि छत्तीसगढ़ के दूरस्थ वनांचलों में ऐसी अनेक खाद्य परंपराएं आज भी जीवित हैं, जिन्हें राष्ट्रीय पहचान मिलनी बाकी है।

महिलाओं ने बदली पहचान

इस पूरी पहल में स्थानीय स्व-सहायता समूहों की महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। उन्होंने न केवल पारंपरिक व्यंजन तैयार किए बल्कि यह भी दिखाया कि स्थानीय कृषि उत्पादों को यदि सही मंच और बाजार मिले तो वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बना सकते हैं।

ऐसी पहलें महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ-साथ पारंपरिक व्यंजनों और स्थानीय कृषि उत्पादों के संरक्षण का माध्यम भी बन रही हैं।

सिर्फ स्वाद नहीं, जैव विविधता की भी कहानी

विशेषज्ञ मानते हैं कि chhattisgarh में जिसे धन का कटोरा भी कहते हैं – स्थानीय धान किस्मों का संरक्षण केवल स्वाद बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह कृषि जैव विविधता को सुरक्षित रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।

पारंपरिक धान की अनेक किस्में स्थानीय जलवायु के अनुरूप विकसित हुई हैं। इन्हें बचाए रखना भविष्य की खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ खेती दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

स्थानीय से वैश्विक पहचान की ओर

आज जब पूरी दुनिया पारंपरिक, प्राकृतिक और स्थानीय खाद्य पदार्थों की ओर लौट रही है, तब अबूझमाड़ का अरक चावल भी नई पहचान बना रहा है। विधानसभा तक इसकी पहुंच इस बात का संकेत है कि यदि स्थानीय उत्पादों को उचित मंच मिले तो वे केवल किसी गांव या जिले तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे प्रदेश और देश की पहचान बन सकते हैं।

शायद यही वजह है कि अबूझमाड़ के जंगलों से उठी इस चावल की भीनी खुशबू अब केवल रसोई तक सीमित नहीं रही, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय किसानों की मेहनत की नई पहचान बनकर सामने आ रही है।

Sonal Gupta

Content Writer

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