जब भी भारत में सेब की खेती की बात होती है, लोगों के मन में सबसे पहले हिमाचल प्रदेश या कश्मीर की तस्वीर उभरती है।
लेकिन अब छत्तीसगढ़ का एक जिला इस सोच को धीरे-धीरे बदल रहा है।
यह जिला है — जशपुर।
घने जंगलों, पहाड़ियों और आदिवासी संस्कृति के लिए पहचाना जाने वाला जशपुर आज खेती में एक नई क्रांति लिख रहा है। यहाँ के किसान अब सिर्फ धान या पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं हैं। वे सेब, नाशपाती, स्ट्रॉबेरी, लीची और चाय जैसी उद्यानिकी एवं नगदी फसलों के जरिए अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।
और सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह बदलाव किसी बड़े कॉर्पोरेट मॉडल से नहीं, बल्कि स्थानीय किसानों की मेहनत, प्रशिक्षण और सही मार्गदर्शन से संभव हुआ है।
जब किसानों ने बदली खेती की दिशा
कुछ साल पहले तक जशपुर के अधिकांश किसान परंपरागत खेती पर निर्भर थे। आमदनी सीमित थी और मौसम पर निर्भरता ज्यादा।
लेकिन धीरे-धीरे किसानों ने समझा कि अगर कम जमीन से ज्यादा आय चाहिए, तो फसल विविधिकरण जरूरी है।
इसी सोच ने जिले में उद्यानिकी खेती की नींव मजबूत की।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निर्देश पर जिला प्रशासन, नाबार्ड और उद्यानिकी विभाग ने किसानों को नई फसलों के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया। किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, पौधे, बाजार से जुड़ाव और आधुनिक खेती की जानकारी दी गई।
इन प्रयासों का असर अब साफ दिखाई देने लगा है।
जशपुर में उग रहे हैं ‘कश्मीर जैसे’ सेब
शायद कुछ साल पहले तक किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि छत्तीसगढ़ में सेब के बगीचे तैयार होंगे।
लेकिन जशपुर ने यह कर दिखाया।
वर्ष 2023 में जिले में सेब उत्पादन की शुरुआत हुई थी। आज करीब 410 एकड़ में सेब की खेती हो रही है और लगभग 410 किसान इससे जुड़े हैं।
मनोर, बगीचा विकासखंड और शैला, छतौरी, करदना व छिछली जैसे क्षेत्रों में लगाए गए सेब के पेड़ इस साल शानदार फल दे रहे हैं।
स्थानीय किसानों का दावा है कि स्वाद और गुणवत्ता के मामले में जशपुर के सेब हिमाचल और कश्मीर के सेबों को टक्कर दे रहे हैं।
रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट सोसायटी के अध्यक्ष राजेश गुप्ता बताते हैं कि जिले के कई किसान अब अपनी एक-एक एकड़ जमीन पर सेब की व्यावसायिक खेती कर रहे हैं।
नाशपाती बन रही किसानों की मजबूत कमाई
अगर जशपुर की पहचान किसी फसल ने सबसे ज्यादा मजबूत की है, तो वह है — नाशपाती।
आज जिले में करीब 3500 एकड़ में नाशपाती के बाग हैं और इससे 3500 से अधिक किसान जुड़े हुए हैं।
सन्ना, पंडरापाठ, कंवई, महुआ, मनोरा और गीधा जैसे इलाकों में बड़े पैमाने पर नाशपाती उत्पादन हो रहा है।
यहाँ से फल सीधे दिल्ली, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों तक भेजे जाते हैं।
जिले में हर साल लगभग 1.75 लाख क्विंटल नाशपाती का उत्पादन हो रहा है।
सबसे बड़ी बात — किसानों को इससे प्रति एकड़ लगभग 1 से 1.5 लाख रुपये तक की आमदनी हो रही है।
चाय और स्ट्रॉबेरी भी बढ़ा रहे पहचान
जशपुर में चाय की खेती पहले से होती रही है, लेकिन अब इसकी गुणवत्ता और बाजार दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं।
इसके अलावा स्ट्रॉबेरी और लीची जैसी फसलें भी किसानों को नई संभावनाएँ दे रही हैं।
यह बदलाव सिर्फ खेती का नहीं, बल्कि सोच का भी है।
जहाँ पहले किसान सिर्फ जीविका के लिए खेती करते थे, वहीं अब वे बाजार की मांग और बेहतर आमदनी को ध्यान में रखकर खेती कर रहे हैं।
क्यों खास है जशपुर का यह मॉडल?
भारत में खेती की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है — कम आय।
ऐसे में जशपुर का मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण बन जाता है क्योंकि यहाँ किसानों ने कम जमीन में ज्यादा लाभ देने वाली फसलों को अपनाया।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर रहना किसानों के लिए मुश्किल हो सकता है। फसल विविधिकरण ही टिकाऊ आय का रास्ता बन सकता है।
जशपुर इसी बदलाव का उदाहरण बनकर उभर रहा है।
खेती से बदल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था
उद्यानिकी फसलों के बढ़ते उत्पादन ने सिर्फ किसानों की आय नहीं बढ़ाई, बल्कि पूरे स्थानीय बाजार को भी मजबूत किया है।
पैकिंग, परिवहन, मजदूरी और छोटे व्यापार जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार बढ़ा है।
कई युवा जो पहले शहरों की ओर पलायन करते थे, अब खेती में ही अवसर तलाश रहे हैं।
भविष्य की नई पहचान बन सकता है जशपुर
छत्तीसगढ़ का जशपुर आज यह साबित कर रहा है कि सही मार्गदर्शन, स्थानीय जलवायु और किसानों की इच्छाशक्ति मिल जाए तो खेती की तस्वीर बदली जा सकती है।
जहाँ देश के कई हिस्सों में किसान खेती छोड़ने को मजबूर हैं, वहीं जशपुर के किसान खेती को नए अवसर में बदल रहे हैं।
शायद आने वाले समय में जशपुर सिर्फ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए नहीं, बल्कि “भारत के नए हॉर्टिकल्चर हब” के रूप में भी जाना जाएगा।
