कलेक्टर दीदी: जब एक IAS अधिकारी ने फाइलों से ज़्यादा बेटियों के सपनों को प्राथमिकता दी
अक्सर जिला कलेक्टरों की पहचान दफ्तर, फाइलों, बैठकों और सरकारी योजनाओं की समीक्षा तक ही सीमित रही है. लेकिन गुजरात के छोटा उदयपुर ज़िले की IAS अधिकारी गार्गी जैन (IAS Officer Gargi Jain) ने प्रशासन को एक अलग पहचान दी है।
हर सप्ताह वे अपने व्यस्त कार्यक्रम में से समय निकालकर आदिवासी क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में जाती हैं। निरीक्षण या औपचारिक भाषण देने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि छात्राओं के साथ बैठकर खुलकर बातचीत करने के लिए.
इसी पहल (initiative) का नाम है “Collector in Classroom”।
आज स्थिति यह है कि स्कूल की बच्चियां उन्हें “मैडम कलेक्टर” नहीं, बल्कि प्यार से “कलेक्टर दीदी” (Collector Didi) कहकर बुलाती हैं।
बातचीत जिसने बदल दी सोच
यह पहल शुरुआत में केवल एक साधारण संवाद का प्रयास थी। लेकिन धीरे-धीरे यह छात्राओं के लिए भरोसे और प्रेरणा का माध्यम बन गई।
आज यह अभियान जिले के पांच कन्या विद्यालयों की 750 से अधिक छात्राओं तक पहुंच चुका है।(Tribal Girls Education)
इनमें से कई छात्राएं अपने परिवार की पहली पीढ़ी हैं जो स्कूल तक पहुंची हैं। कुछ आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही हैं, तो कुछ सामाजिक दबाव, कम उम्र में शादी (child marriage) या बड़े सपने देखने के डर से संघर्ष कर रही हैं।
ऐसे में गार्गी जैन ने प्रशासन और समाज के बीच की दूरी को कम करते हुए सीधे कक्षा में पहुंचने का फैसला किया।
करियर से लेकर आत्मविश्वास तक, हर विषय पर खुली चर्चा
इन बैठकों में केवल पढ़ाई की बात नहीं होती। (career guidance)
गार्गी जैन छात्राओं से करियर, नेतृत्व, कानूनी अधिकार, उच्च शिक्षा और गांव से बाहर मौजूद अवसरों पर चर्चा करती हैं।
छात्राएं उनसे बेझिझक सवाल पूछती हैं—
- IAS कैसे बनें?
- UPSC की तैयारी कैसे करें?
- Doctor या Engineer बनने का रास्ता क्या है?
- पुलिस सेवा और अन्य सरकारी नौकरियों में कैसे जाएं?
लेकिन बातचीत यहीं तक सीमित नहीं रहती।
गार्गी जैन अपने जीवन के संघर्षों और कठिन अनुभवों को भी छात्राओं के साथ साझा करती हैं। इससे बच्चियां भी अपनी उन समस्याओं के बारे में खुलकर बात करने लगती हैं, जिन्हें वे अक्सर घर पर भी नहीं बता पातीं।
धीरे-धीरे यह कक्षा केवल पढ़ाई की जगह नहीं रहती, बल्कि एक ऐसा सुरक्षित माहौल बन जाती है जहां बेटियां बिना डर अपनी बात कह सकती हैं।(girls safety)
पहल का असर आंकड़ों में भी दिखा
इस अनोखी पहल के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं।
- करीब 4,500 बच्चे एक वर्ष के भीतर दोबारा स्कूल लौटे।
- छात्राओं का ड्रॉपआउट लगभग 60 प्रतिशत तक कम हुआ।
हालांकि गार्गी जैन के लिए सफलता केवल इन आंकड़ों तक सीमित नहीं है।
उनका सपना इससे कहीं बड़ा है।
वे कहती हैं,
“मैं तब तक नहीं रुकूंगी, जब तक आदिवासी समुदाय की पांच बेटियां IAS अधिकारी नहीं बन जातीं।”
बदलाव की शुरुआत सुनने से होती है
नेतृत्व केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि लोगों की बात सुनने से भी आता है।
गार्गी जैन की यह पहल इसी बात का उदाहरण है कि जब प्रशासन संवेदनशीलता के साथ समाज के बीच पहुंचता है, तो बदलाव केवल नीतियों में नहीं, बल्कि लोगों के आत्मविश्वास और सपनों में भी दिखाई देता है।
हो सकता है आने वाले वर्षों में कोई आदिवासी बेटी UPSC की परीक्षा पास करे। और जब उससे उसकी प्रेरणा पूछी जाए, तो वह मुस्कुराकर कहे—
“मेरी कलेक्टर दीदी।”

