जब आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर सामाजिक विषमता और छुआछूत के खिलाफ एक शांत क्रांति बन जाती है, तो इतिहास रचा जाता है। छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों से उठी ऐसी ही एक अनोखी और मर्मस्पर्शी भक्ति परंपरा आज देश के सबसे बड़े मंच पर गौरवान्वित हुई है।
72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (72nd National Film Awards) समारोह में छत्तीसगढ़ के अनूठे रामनामी समुदाय के जीवन, इतिहास और अटूट भक्ति पर आधारित वृत्तचित्र ‘राम-नामी’ (Ram-Nami) को सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री (Best Documentary) के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा दिया गया यह सम्मान केवल एक फिल्म की सफलता नहीं है, बल्कि सदियों से सामाजिक तिरस्कार सहते हुए भी ईश्वर को अपने शरीर पर धारण करने वाले एक पूरे समाज के संघर्ष और स्वाभिमान की जीत है।
कौन है रामनामी समाज? भक्ति और विद्रोह की अनूठी मिसाल
19वीं सदी के उत्तरार्ध (लगभग 1890 के दशक) में जब तत्कालीन समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत चरम पर थी, तब दलित और वंचित वर्ग के लोगों को मंदिरों में प्रवेश करने और भगवान राम का नाम लेने से रोका जाता था।
इस सामाजिक अन्याय के विरोध में छत्तीसगढ़ के महान समाज सुधारक परशुराम रामनामी ने एक मूक परंतु अभूतपूर्व क्रांति की शुरुआत की।
- शरीर पर राम नाम का गोदना: जब उन्हें मंदिरों में जाने से रोका गया, तो उन्होंने कहा, “यदि तुम हमें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दोगे, तो हम ईश्वर को अपने पूरे शरीर में ही बसा लेंगे।”
- अहिंसक प्रतिरोध: समाज के लोगों ने अपने चेहरे, माथे, हाथों और पूरे शरीर पर सुई से ‘राम-राम’ का स्थाई टैटू (गोदना) बनवाना शुरू कर दिया।
- अनोखी वेशभूषा: शरीर पर राम नाम गोदवाने के अलावा, ये साधक राम नाम लिखा वस्त्र (ओढ़नी) धारण करते हैं और सिर पर मोरपंखों से बना मुकुट (काप) पहनते हैं।
उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि राम किसी एक वर्ग या जाति की जागीर नहीं हैं, बल्कि वे कण-कण और हर सांस में बसने वाले निर्गुण ब्रह्म हैं।
डॉक्यूमेंट्री का उद्देश्य: विलुप्त होती परंपरा को सहेजना
प्रसिद्ध निर्देशक भरतबाला गणपति (Virtual Bharat) और निर्माता-लेखक भरतलाल गणपत द्वारा निर्देशित इस डॉक्यूमेंट्री का उद्देश्य केवल एक कहानी सुनाना नहीं था, बल्कि आधुनिकता की दौड़ में विलुप्त हो रही इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत को सहेजना था।
आज के दौर में नई पीढ़ी उच्च शिक्षा और रोजगार के चलते पूरे शरीर पर गोदना (सर्वांग रामनामी) बनवाने से कतराती है। वर्तमान में पूरे शरीर पर ‘राम’ नाम धारण करने वाले वयोवृद्ध साधकों की संख्या बहुत कम रह गई है।
फिल्म निर्माताओं ने इस वृत्तचित्र के माध्यम से:
- रामनामी समाज के अंतिम बचे वृद्ध साधकों के अनुभवों और भजनों को प्रामाणिक रूप से दर्ज किया।
- प्रसिद्ध गायक कैलाश खेर की रूहानी आवाज का उपयोग कर इस भक्ति यात्रा को संगीतमय गहराई प्रदान की।
- भावी पीढ़ियों के लिए इस ऐतिहासिक और सामाजिक क्रांति का एक जीवित दस्तावेज तैयार किया।
फिल्म निर्माण का कठिन सफर
राष्ट्रीय पुरस्कार तक पहुँचने का यह सफर आसान नहीं था। इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने में निर्माताओं को कई वर्षों का कठिन परिश्रम और आत्मीय संघर्ष करना पड़ा:
- भरोसा जीतना: रामनामी समाज अपनी साधना में बेहद शांत और एकांतप्रिय रहता है। बाहरी दुनिया और कैमरों के सामने अपनी आध्यात्मिक भावनाओं को व्यक्त कराने के लिए फिल्म टीम को महीनों उनके साथ रहकर उनका विश्वास जीतना पड़ा।
- दुर्गम ग्रामीण इलाकों में शूटिंग: छत्तीसगढ़ के जंजगीर-चांपा, बिलासपुर और रायपुर के सुदूर ग्रामीण अंचलों में भीषण गर्मी और विपरीत परिस्थितियों के बीच शूटिंग की गई।
- सीमित संसाधन और जुनून: बिना किसी व्यावसायिक लालच के, केवल सांस्कृतिक निष्ठा और जुनून के बल पर इस प्रोजेक्ट को पूरा किया गया। टीम ने सदियों पुराने भजनों और अनसुनी कथाओं को रिकॉर्ड करने के लिए कई रात जागकर समय बिताया।
एक राष्ट्रीय सम्मान जो आँखों में नमी और गर्व लाता है
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना, हर छत्तीसगढ़िया और हर उस व्यक्ति के लिए गर्व का क्षण था जो सामाजिक समानता में विश्वास रखता है।
यह पुरस्कार उन बुजुर्ग रामनामियों के नाम समर्पित है जिन्होंने अपनी देह को ही मंदिर बना दिया। बिना किसी शिकायत या हिंसा के, केवल भक्ति और राम नाम के सहारे छुआछूत जैसी कुप्रथा को हराने वाले इस समाज की कहानी आज पूरे देश के दिलों को छू रही है।
📽️ आस्था और स्वाभिमान की इस यात्रा को करीब से देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल पर रामनामी समाज का यह विशेष वीडियो अवश्य देखें।

