हर घर की चुप्पी एक जैसी नहीं होती…
बचपन में हमें सिखाया जाता है कि घर सबसे सुरक्षित जगह है। एक ऐसी जगह जहाँ हमें बिना शर्त प्रेम मिलेगा, अपनापन मिलेगा और हम जैसे हैं वैसे स्वीकार किए जाएँगे। लेकिन बड़े होते-होते एक सच्चाई धीरे-धीरे सामने आने लगती है…
हर घर की कहानियाँ अलग हैं
हर घर में दीवारें एक जैसी होती हैं, पर उनके भीतर रहने वाली कहानियाँ नहीं। कुछ घरों में हँसी गूँजती है, तो कुछ घरों में चुप्पियाँ। कुछ घरों में लोग खुलकर रो लेते हैं, तो कुछ घरों में आँसू भी अनुमति माँगते हैं।
कई बार परिवार टूटते नहीं हैं…वे बस धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं। बातें होती रहती हैं, लेकिन संवाद (healthy communication) खत्म हो जाता है। लोग साथ बैठते हैं, लेकिन एक-दूसरे तक पहुँच नहीं पाते।और सबसे दर्दनाक बात (emotional wounds) यह है कि यह दूरी एक दिन में नहीं बनती। यह उन अनगिनत बातों से बनती है जो कभी कही नहीं गईं…उन भावनाओं से जो हमेशा दबा दी गईं…उन घावों से जिन्हें “घर की बात” कहकर छुपा लिया गया।
कई बार अतीत में छुपे होते हैं कई उत्तर
भी सोचा है? क्यों कुछ लोग छोटी-सी बात पर बहुत गुस्सा हो जाते हैं? क्यों कुछ लोग हर समय खुद को साबित करने की कोशिश करते रहते हैं? क्यों कुछ लोग प्रेम मिलने के बाद भी उसे खो देने से डरते रहते हैं? अक्सर इसका उत्तर वर्तमान में नहीं, उनके अतीत में छुपा होता है।
हम सब अपने साथ केवल यादें नहीं लाते…हम अपने घरों का वातावरण (family environment) भी साथ लेकर चलते हैं। बचपन की आवाज़ें, माता-पिता के रिश्ते, घर का डर, घर की सुरक्षा, घर का सम्मान, घर की चुप्पियाँ…
सब हमारे भीतर कहीं न कहीं जीवित रहते हैं। इसीलिए कई बार बड़े होने के बाद भी हम वही प्रतिक्रियाएँ देते हैं जो कभी एक डरे हुए बच्चे ने सीख ली थीं।
दुनिया अक्सर लोगों के व्यवहार को देखती है।लेकिन व्यवहार के पीछे छुपे दर्द (childhood trauma)को नहीं। हर कठोर व्यक्ति बुरा नहीं होता। हर चुप व्यक्ति कमजोर नहीं होता, हर मुस्कुराता चेहरा खुश नहीं होता। और हर परिवार स्वस्थ नहीं होता, चाहे वह बाहर से कितना भी आदर्श क्यों न दिखाई दे।
सच्चाई यह है कि परिवार की मजबूती इस बात से तय नहीं होती कि उसमें कितने लोग साथ रहते हैं…बल्कि इस बात से तय होती है कि उनमें से कितने लोग एक-दूसरे के सामने अपनी सच्चाई के साथ खड़े हो सकते हैं। क्योंकि जहाँ संवाद खत्म हो जाता है, वहाँ दूरी जन्म लेती है। और जहाँ सत्य दबा दिया जाता है, वहाँ पीढ़ियाँ उसकी कीमत चुकाती हैं। शायद इसलिए स्वस्थ परिवार वे नहीं हैं जहाँ कभी कोई समस्या नहीं होती…
स्वस्थ परिवार वे हैं जहाँ समस्याओं पर बात करने का साहस होता है। जहाँ चुप्पी की जगह संवाद (open communication) हो…निर्णय की जगह समझ (empathy, emotional intelligence) हो…और केवल साथ रहने की नहीं, बल्कि एक-दूसरे को सचमुच सुनने की इच्छा हो। क्योंकि अंततः…हर इंसान को एक परफेक्ट परिवार नहीं चाहिए होता, उसे बस एक ऐसी जगह चाहिए होती है जहाँ वह बिना डर के खुद हो सके।
-डॉ. कीर्ति सिसोदिया

