Kanaklata Barua: 18 साल की वीरांगना जिसने जीवन का बलिदान दे दिया, पर तिरंगे को झुकने नहीं दिया !


भारत ने संग्राम का वो दौर भी देखा है जब देश के बच्चे, युवा और बुजुर्ग, सभी में क्रांति की लहर दौड़ रही थी। फिर वो चाहे उत्तर का अवध हो, पश्चिम का राजपूताना हो, दक्षिण का मद्रास हो या फिर पूर्व का बंगाल। सभी जगह आजादी की चाहत क्रांतिकारियों में खून बनकर में दौड़ रही थी। इन कहानियों में एक कहानी कनकलता बरूआ (Kanaklata Barua) की भी है। जिन्होंने जान की परवाह किए बिना देशप्रेम की अद्भत मिसाल पेश की जिसे वर्षों तक भुलाया नहीं जा सकता है।
 
22 दिसंबर 1924 को असम में कनकलता (Kanaklata Barua) का जन्म कृष्णकांत बरूआ के घर हुआ। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया। पढ़ाई में काफी तेज कनकलता का लालन-पालन उनकी नानी ने किया। इन्हीं दिनों असम के प्रसिद्ध कवि ज्योति प्रसाद अग्रवाल के गीत देश भर के युवाओं को प्रेरित कर रहे थे। उनकी रचनाओं से कनलता भी काफी प्रभावित हुईं। और उनके बाल मन में देशभक्ति के बीज अंकुरित हुए।
 
मई 1931 की बात है। असम के गमेरी गाँव में क्रांतिकारी विद्यार्थियों ने मिलकर रैयत सभा का आयोजन किया। इसकी अध्यक्षता कवि ज्योति प्रसाद अग्रवाल कर रहे थे। इसी सभा में कनकलता (Kanaklata Barua) के मामा देवेन्द्र नाथ शामिल होने वाले थे। जब कनकलता को ये बात पता चली तो ज़िद कर मात्र 7 साल की कनकलता भी उस सभा में शामिल हो गईं। अंग्रेजों ने सभा में शामिल सभी क्रांतिकारियों पर लाठी बरसाए और उन्हें जेल में डाल दिया। यहीं से नन्हीं कनकलता की, आजादी के संग्राम में कूदने की औपचारिक शुरूआत हुई।
 
8 अगस्त 1942 को “अंग्रेज़ों भारत छोड़ो” प्रस्ताव परित हुआ। देश के कोने-कोने में इसकी चिंगारी फैल गयी और ज्योति प्रसाद अग्रवाल के कंधों पर आ गई। उन्होंने एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इस सभा में यह तय किया गया, कि 28 सितंबर 1942 को असम के तेजपुर की कचहरी पर तिरंगा फहराया जाएगा। तिरंगा फहराने वाले दल के नेतृत्व के लिए 18 साल की कनकलता को चुना गया।
 
28 सितंबर की सुबह जब क्रांतिकारियों का जत्था कचहरी के सामने पहुंचा तब अंग्रेज सिपाही ने चेतावनी दी ” कोई अगर एक इंच भी आगे बढ़ा तो उसे गोलियों से छलनी कर दिया जाएगा। ” निडर कनकलता हाथों में भारत का तिरंगा लिए आगे बढ़ती रही। उन्होंने चेतावनी के बावजूद अपने कदम कचहरी की तरफ बढ़ाए, उनके साथ क्रांतिकारियों का जुलूस आगे बढ़ा। जैसे ही कनकलता आगे बढ़ीं अंग्रेज सिपाहियों ने गोलियों की बौझार कर दी। पहली गोली कनकलता की छाती पर लगी पर वो रूकी नहीं, उनके साहस और बलिदान ने जुलूस को आगे बढ़ने का बल दिया। कनकलता (Kanaklata Barua) का गोलियों से छलनी शरीर जमीन पर गिरता उससे पहले क्रांतिकारी रामपति राजखोवा ने तिरंगा थामा और कचहरी पर भारतीय झंडा फहरा दिया। कनकलता भारत माता की जय कहते हुए शहीद हो गईं।
 
कनकलता का बलिदान हमेशा अमर रहेगा। ये उनका साहस ही था जिसने कई युवाओं को आजादी के लिए लड़ने की प्रेरणा दी। भले ही कनकलता बरूआ (Kanaklata Barua) कम उम्र में ही शहीद हो गईं। पर वे भारतीयों के दिल में हमेशा अमर रहेंगी।
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