हबीब तनवीर, आदिवासी कलाकारों के साथ अपने काम के लिए प्रसिध्द प्रतिष्ठित नाटककार और निर्देशक

प्रसिद्ध रंगर्कमी जिनका जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ, लेकिन उन्होने भारत का नाम
विदेशों में भी
रौशन किया। वह इकलौते भारतीय थे जो रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट लंदन केलिए
चयनित हुए । उन्होने छत्तीसगढ़ की संस्कृति फोल्क फॉर्म को
भी पूरी दुनिया से परिचित
करवाया।

हबीब तनवीर बहु प्रतिभावान व्यक्ति थे। वह भारत के
सबसे लोकप्रिय उर्दू
, हिन्दी नाटककारों, थिएटर निर्देशक,
कवि और अभिनेताओं में से एक थे।
हबीब
, आगरा बाज़ार (1954) और चरणदास चोर (1975) जैसे प्रसिद्ध
नाटकों के लेखक थे। उर्दू और हिन्दी थिएटर में अग्रणी
, वह छत्तीसगढ़ी आदिवासियों के साथ अपने काम के लिए सबसे
ज्यादा जाने जाते थे। उन्होंने साल 1959 में भोपाल में एक थिएटर कंपनी की स्थापना
की थी।

हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ को बेहतर तरिके से समझने के
लिए राज्य के भीतर जाकर काम किया और वहीं छत्तीसगढ़ के स्थानीय ग्राम कलाकारों से
मुलाकात की और उनके साथ काम भी किया। वह अपने नाटकों में लोक परंपराओं का इस्तेमाल
किया करते थे।
 

नाम बदलकर किया तनवीर

1 सितंबर 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हबीब अहमद
खान का जन्म हुआ था। कविता लिखना शुरू करने के बाद उन्होनें अपना नाम बदलकर हबीब
तनवीर रख लिया था। हबीब ने अपनी पढ़ाई अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पूरी की
थी। पढ़ाई पूरी होने के बाद वह 1945 में मुंबई चले गए।
 

इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन के साथ जुड़े

मुंबई में वह एक लेखक, अभिनेता और पत्रकार के रूप में इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन और प्रोग्रेसिव
राइटर्स एसोसिएशन के साथ जुड़े रहे। मंबई में रहते हुए
, उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिए गीत लिखे और कुछ में अभिनय
भी किया।
 

कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया

हबीब ने अपने जीवनकाल के दौरान कई राष्ट्रीय और
अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीते है। इनमें 1969 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
, 1983 में पद्म श्री,
कालिदास सम्मान 1990, 1996 में संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप और 2002 में पद्म भूषण
शामिल हैं।
 

थिएटर के लिए किया काम

1942 में मुंबई में इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन का
गठन किया गया था। तनवीर भी जल्द ही इसका हिस्सा भी बन गए। यह वही समय था जब तनवीर
ने आकस्मिक रूप से
, कविता और सीनेमा की जगह अपना समय
रंगमंच के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया था। हबीब तनवीर 1954 में दिल्ली चले गए
और कुदसिया जैदी हिंदुस्तानी थिएटर के लिए काम करने लगे।

यूरोप से की आगे की पढ़ाई

1955 में
तनवीर आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चले गए। लंडन में उन्होनें रॉयल एकेडमी ऑफ
ड्रामेटिक आर्ट्स (
RADA) से अभिनय और ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल (1956) से
निर्देशन सिखा । यूरोप मे रहते हुए तनवीर ने कई तरह के थिएटर को करीब से जाना।

 ब्रेख्त से मिलने पहुंचे बर्लिन

1956 में तनवीर के जीवन में कई बदलाव आए। तनवीर बर्टोल्ट ब्रेख्त को अपनी
प्रेरणा मानते थे। कहा जाता है की तनवीर, ब्रेख्त से मिलने ही बर्लिन गए थे। लेकिन
वहां जाकर उन्हें पता चला की हाल ही में ब्रेख्त ने अपनी आखरी सांसे ली थी, जिससे
तनवीर गंभीर रूप से प्रभावित हुए ।

इसके बाद उन्होंने कुछ महिनें बर्लिन में हीं बिताए। तनवीर, बर्लिन में कई
महीने ब्रेख्त की प्रस्तुतियों को देखने में बिताए। जिसका उन पर एक स्थायी प्रभाव
साबित हुआ। पाश्चात्य-सांस्कृतिक कहानियों और विचारधाराओं को व्यक्त करने केलिए
तनवीर ने अपने नाटकों में भी स्थानीय मुहावरों का उपयोग करना शुरू कर दिया था।

गांव के प्रतिभा को शहर में लाना चाहते थे तनवीर

हबीब तनवीर का मानना था कि रंगमंच की असली प्रतिभा
गांवों में मौजूद थी
, जिन्हें सही दिशा और मंच नहीं मिल
पा रहा था। ऐसे ही प्रतिभाशाली रंगमंच के कलाकारों को तनवीर शहर में एक मंच
दिलवाना चाहते थे। तनवीर छत्तीसगढ़ की परंपरा और संस्कृति समझने केलिए राज्य में
कई जगह गए और वहाँ के कलाकारों के साथ काम भी किया। लगभग पांच दशकों तक
, उन्होंने विशेष रूप से गाँव के कलाकारों के साथ काम किया।

भारत लौंट कर की नया थिएटर की स्थापना

एक गहरी प्रेरणा से प्रेरित हबीब 1958 में भारत लौटे और पूर्णकालिक निर्देशन में लग गए। उन्होंने
लंदन से वापस लौंट कर
मिट्टी की गाड़ी का निर्माण किया। यह शूद्रक की
संस्कृत कृति मृचकतिका पर आधारित थी। छत्तीसगढ़ी में यह उनका पहला महत्वपूर्ण प्रोडक्शन
था। इसके बाद उन्होंने
1959 में एक थिएटर कंपनी “नया
थिएटर” की स्थापना की।

रंगमंच को तनवीर ने अपने हुनर से एक अलग हीं रूप दे
दिया था। उनके काम की विशिष्टता यह दिखाती थी कि कैसे भारतीय रंगमंच एक साथ ट्रेडिशनल
और मॉर्डन हो सकता है।

उनकी प्रस्तुतियों ने पारंपरिक या लोक प्रदर्शन के
परंपराओं का सफलतापूर्वक उपयोग किया। जिसका नतीजा यह हुआ कि उनका रंगमंच जितना
मनोरंजक था उतना ही दिलचस्प भी था।

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Dr. Kirti Sisodhia

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