Ansuni Gaatha: भारत अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। 26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ, तो यह सिर्फ एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों का घोषणापत्र था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आधुनिक भारत की इस ‘गीता’ को लिखने में हमारे छत्तीसगढ़ की माटी के सपूतों का कितना बड़ा हाथ था?
आज Seepositive के इस खास वीडियो में हम संविधान सभा के उन अनसुनी गाथा को जानेंगे जिसमें उन 6 महानायकों की पूरी कहानी है जिन्होंने संविधान की मूल भावना में छत्तीसगढ़ की आवाज को शामिल किया।
क्यों मनाते हैं गणतंत्र दिवस?
इतिहास की बात करें तो 26 जनवरी की तारीख का चयन यूं ही नहीं किया गया था। 26 जनवरी 1930 को लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ का संकल्प लिया गया था। इसी स्मृति को जीवंत रखने के लिए 24 जनवरी 1950 को संविधान पर अंतिम हस्ताक्षर हुए और दो दिन बाद, यानी 26 जनवरी को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के पहले राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। संविधान सभा की यात्रा अद्भुत थी 165 दिनों की बैठकों और 7,000 से अधिक संशोधनों पर बहस के बाद एक ऐसा संविधान तैयार हुआ जो दुनिया के लिए मिसाल बन गया।
संविधान सभा के 299 सदस्यों में से 6 सदस्य छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। ये सिर्फ सदस्य नहीं थे, बल्कि सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय विकास के पैरोकार थे।
पंडित रविशंकर शुक्ल
रायपुर के शुक्ल जी मध्यप्रांत और बरार के प्रमुख चेहरे थे। उन्हें हिंदी को राजभाषा बनाने का मुख्य सूत्रधार माना जाता है। 13 सितंबर 1949 को उन्होंने देवनागरी लिपि और हिंदी के पक्ष में जो ऐतिहासिक भाषण दिया, उसी का परिणाम है कि आज हिंदी हमारी संघ की राजभाषा है। साथ ही, शिक्षा को समवर्ती सूची में रखवाकर उन्होंने केंद्र और राज्य दोनों को शिक्षा पर अधिकार दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई।
बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल
अकलतरा के एक जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाले ठाकुर छेदीलाल छत्तीसगढ़ के पहले बैरिस्टर थे। उन्होंने संविधान की विधायी बारीकियों और सामाजिक न्याय पर अपनी विशेषज्ञ राय दी। वे कई भाषाओं के ज्ञाता थे और उन्होंने अपनी विद्वत्ता से बहस को समृद्ध किया।
घनश्याम सिंह गुप्ता
दुर्ग की इस विभूति ने संविधान के हिंदी अनुवाद की जिम्मेदारी संभाली। हिंदी अनुवाद समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि संविधान की भाषा आम भारतीय की समझ में आने वाली हिंदी हो।
पंडित किशोरी मोहन त्रिपाठी
रायगढ़ रियासत से आए त्रिपाठी जी सभा के सबसे युवा सदस्यों में से एक थे। उन्होंने ‘ग्राम स्वराज’ और ‘पंचायती राज’ की वकालत की। उन्होंने बाल श्रम के खिलाफ कड़े कानूनों के पक्ष में मजबूती से अपनी बात रखी।
रामप्रसाद पोटाई
कांकेर के कन्हारपुरी से आने वाले पोटाई जी ने संविधान सभा में आदिवासियों की बुलंद आवाज बनी। डॉ. अंबेडकर के साथ मिलकर उन्होंने अनुसूचित जनजाति और जाति के अधिकारों को संवैधानिक सुरक्षा दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राय साहब रघुराज सिंह
सरगुजा रियासत के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने रियासती हितों और क्षेत्रीय एकीकरण के मुद्दों पर अपना पक्ष रखा।
संविधान निर्माण के इस पूरी प्रक्रिया में डॉ. अंबेडकर ने सबसे अधिक 2.6 लाख से ज्यादा शब्द बोले? कुल 36 लाख शब्दों के मंथन से हमारा संविधान निकला। इस पूरे निर्माण में उस समय ₹63,96,721 खर्च हुए थे। एक और खास बात
संविधान सभा में राजद्रोह को हटाने का प्रस्ताव के.एम. मुंशी ने दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना जनता का अधिकार है। 14 अगस्त 1947 की आधी रात को जब सत्र शुरू हुआ, तो आजादी से ठीक पहले मौन रखकर उन शहीदों को याद किया गया जिनकी बदौलत हम आज स्वतंत्र हैं।
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