विकसित छत्तीसगढ़ के संकल्प में नारी शक्ति की पूरी भागीदारी: स्वावलंबन, नवाचार और मेहनत

छत्तीसगढ़ को एक विकसित, समृद्ध और सशक्त राज्य बनाने के संकल्प में प्रदेश की नारी शक्ति सबसे अग्रणी भूमिका निभा रही है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के कुशल नेतृत्व में राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं, स्व-सहायता समूहों (SHGs) के नेटवर्क और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के माध्यम से ग्रामीण और वनांचल अंचलों की महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।

पारंपरिक खेती-किसानी से लेकर व्यावसायिक सुगंधित फसलों की खेती, जैविक खाद उत्पादन, पशुपालन और आधुनिक ड्रिप सिंचाई तकनीकों को अपनाकर छत्तीसगढ़ की बहनें आज लखपति दीदी बनकर समाज के लिए प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं।

नारी सशक्तिकरण की प्रमुख उपलब्धियां

राज्य में महिलाओं की भागीदारी और उनके जीवन स्तर में आए बदलाव को दर्शाने वाले प्रमुख आंकड़े:

क्षेत्र / योजनाप्रमुख उपलब्धि एवं आंकड़े
लखपति दीदी योजना13 लाख से अधिक महिलाएं बनीं लखपति दीदी
स्व-सहायता समूह (SHG)31 लाख से अधिक महिलाएं स्व-सहायता समूहों से जुड़ीं
अबूझमाड़ आजीविका लोन10 महिला SHGs को चक्रीय निधि से ₹37 लाख का ऋण स्वीकृत
वन उपज व कुटीर उद्योगइमली, महुआ, हर्रा, तसर कोकून और हस्तशिल्प से लाखों महिलाओं को आजीविका

जमीन पर बदलाव: सफलता की 4 मिसालें

1. धान के कटोरे में खस की महक: पखनजूर (कांकेर) की अनूठी पहल

कांकेर जिले के पखनजूर/परलकोट क्षेत्र की महिला कृषक उत्पादक समिति ने पारंपरिक धान की खेती के साथ-साथ 2.50 एकड़ क्षेत्र में सुगंधित ‘वेटीवर’ (खस) की खेती शुरू की है।

खस की जड़ों से तेल निकालने, पैकिंग और विपणन की पूरी कमान महिलाओं के हाथों में है। इससे न केवल कम लागत में ज्यादा मुनाफा हो रहा है, बल्कि भू-जल संरक्षण में भी मदद मिल रही है।

2. पशुपालन और वर्मीकंपोस्ट से लखपति दीदी बनीं पुष्पा (जांजगीर-चांपा)

जांजगीर-चांपा जिले की पुष्पा कश्यप ने घर से ही पशुपालन और जैविक खाद (वर्मीकंपोस्ट) निर्माण का व्यवसाय शुरू किया।

बिहान योजना के तहत मिले प्रशिक्षण और वित्तीय मार्गदर्शन के बल पर आज पुष्पा हर साल ₹1 लाख से अधिक की शुद्ध आय अर्जित कर रही हैं और अन्य ग्रामीण महिलाओं को भी इस व्यवसाय से जोड़ रही हैं।

3. मधुकामिनी की व्यावसायिक खेती से संवरी अंजनी की तकदीर (बेमेतरा)

बेमेतरा जिले के ग्राम पंचायत बेरला की अंजनी साहू ने पारंपरिक फसलों के बजाय मधुकामिनी जैसे सजावटी और व्यावसायिक फूलों/पौधों की खेती को अपनाया।

 30 दिनों के भीतर तैयार होने वाले इस पौधे की बाजार में भारी मांग है, जिससे अंजनी प्रतिमाह ₹10,000 से अधिक की आय अर्जित कर अपने परिवार का संबल बनी हैं।

4. ड्रिप और मल्चिंग तकनीक से बदला टमाटर का उत्पादन (महासमुंद)

महासमुंद जिले की भारती कश्यप ने पारंपरिक खेती को छोड़कर टमाटर और हरी सब्जियों की वैज्ञानिक खेती (ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक) को अपनाया।

कम रकबे और कम पानी के बावजूद उन्होंने रिकॉर्ड उत्पादन हासिल कर अपनी वार्षिक आय को कई गुना बढ़ा लिया है।

अबूझमाड़ में भी आजीविका और स्वावलंबन का उजाला

सुदूर और संवेदनशाील क्षेत्र अबूझमाड़ (नारायणपुर) में भी महिलाओं को आर्थिक मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। चक्रीय निधि (Revolving Fund) के माध्यम से 10 महिला स्व-सहायता समूहों को ₹37 लाख का ऋण उपलब्ध कराया गया है।

यहां की महिलाएं अब सिलाई, किराना दुकान, दोना-पत्तल निर्माण, मसाला पिसाई और मुर्गीपालन जैसे गतिविधियों के जरिए अपने परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर रही हैं।

छत्तीसगढ़ में महिलाएं अब केवल परिवार संभालने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देने वाली प्रमुख धुरी बन चुकी हैं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में मिल रहे शासकीय प्रोत्साहन, बिना-गारंटी ऋण सुविधाओं और कौशल प्रशिक्षण के बदौलत छत्तीसगढ़ की मातृशक्ति ‘सशक्त नारी – सशक्त छत्तीसगढ़’ के नारे को धरातल पर चरितार्थ कर रही है।

Sonal Gupta

Content Writer

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