इंसान का कद उसकी शारीरिक ऊंचाई से नहीं, बल्कि उसके विचारों, इरादों और पक्के इरादों से मापा जाता है। इस बात को सच साबित कर दिखाया है गुजरात के भावनगर जिले के 3 फीट 4 इंच लंबे डॉ. गणेश बरैया (Dr. Ganesh Baraiya) ने।
बौनेपन (Dwarfism) और 72 प्रतिशत लोकोमोटर दिव्यांगता के बावजूद, उन्होंने न केवल समाज के तानों और व्यवस्था की चुनौतियों को हराया, बल्कि देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) से अपने हक की कानूनी लड़ाई जीतकर आज एक सरकारी डॉक्टर के रूप में मरीजों की सेवा कर रहे हैं।
आइए जानते हैं कि कैसे एक छोटे से गांव से निकले गणेश ने अभावों, अस्वीकृति और संघर्षों को पीछे छोड़ते हुए चिकित्सा जगत में इतिहास रचा।
जब पिता ने ठुकराया सर्कस का 5 लाख रुपये का ऑफर
डॉ. गणेश बरैया का जन्म गुजरात के भावनगर जिले की तलाजा तहसील के गोरखी गांव (Gorkhi Village) में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। नौ भाई-बहनों के परिवार में जन्मे गणेश बचपन से ही बौनेपन से ग्रस्त थे।
जब गणेश प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते थे, तब एक सर्कस कंपनी उनके घर पहुंची और उनके पिता को 5 लाख रुपये का ऑफर दिया ताकि वे गणेश को सर्कस में काम करने के लिए भेज दें।
एक गरीब किसान परिवार के लिए 5 लाख रुपये बहुत बड़ी रकम थी, लेकिन गणेश के पिता ने पैसे के बजाय अपने बेटे के सम्मान और पढ़ाई को चुना।
उन्होंने सख्त लहजे में सर्कस वालों को मना कर दिया और तय किया कि वे अपने बेटे को एक सम्मानजनक जिंदगी देंगे।
NEET परीक्षा में सफलता, लेकिन सिस्टम ने बंद किए दरवाजे
गणेश बचपन से ही मेधावी थे। उन्होंने 12वीं की बोर्ड परीक्षा में 87% अंक हासिल किए और 2018 में मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET में सफलता प्राप्त की।
उनकी उपलब्धि पर हर कोई खुश था, लेकिन तत्कालीन मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) की मेडिकल बोर्ड समिति ने उनकी कम ऊंचाई और 72% लोकोमोटर विकलांगता का हवाला देते हुए उन्हें MBBS में दाखिला देने से साफ इनकार कर दिया। समिति का तर्क था कि कम ऊंचाई के कारण वे इमरजेंसी केस संभालने में असमर्थ रहेंगे।
गुजरात हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी जंग
सिस्टम के इस फैसले से गणेश टूटे जरूर, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनके स्कूल के प्रिंसिपल डॉ. दलपतभाई कतारिया उनके मार्गदर्शक बने और उनका कानूनी खर्च उठाया।
- गुजरात हाईकोर्ट का फैसला: सबसे पहले मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंचा, लेकिन वहां भी मेडिकल काउंसिल के फैसले को बरकरार रखा गया।
- सुप्रीम कोर्ट में जीत: निराश होने के बजाय गणेश ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया। 22 अक्टूबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल ऊंचाई के आधार पर किसी भी छात्र को मेडिकल शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के इस फैसले के बाद, वर्ष 2019 में गणेश को सरकारी मेडिकल कॉलेज, भावनगर (GMC Bhavnagar) में MBBS सीट पर दाखिला मिला।
दोस्तों और प्रोफेसरों का सहारा: कक्षा से लेकर ऑपरेशन थिएटर तक
मेडिकल कॉलेज का सफर भी गणेश के लिए आसान नहीं था। पढ़ाई के दौरान शारीरिक चुनौतियों को दूर करने में उनके सहपाठियों और शिक्षकों ने अभूतपूर्व भूमिका निभाई:
- क्लासरूम में एनाटॉमी सेशन के दौरान उनके लिए हमेशा पहली सीट आरक्षित रखी जाती थी।
- सर्जरी और प्रैक्टिकल कक्षाओं के दौरान ऑपरेशन टेबल तक देखने के लिए प्रोफेसर और दोस्त उन्हें अपनी गोद में या स्टूल पर बैठाते थे।
गणेश ने अपनी कड़ी मेहनत के बल पर MBBS की पढ़ाई और इंटर्नशिप सफलतापूर्वक पूरी की।
आज सरकारी अस्पताल में सेवाएं दे रहे हैं डॉ. गणेश
आज डॉ. गणेश बरैया भावनगर के सरकारी अस्पताल (Sir Takhtasinhji General Hospital) में मेडिकल ऑफिसर (Class-2) के रूप में कार्यरत हैं। वे प्रतिदिन दर्जनों मरीजों की जांच करते हैं।
डॉ. गणेश बताते हैं कि जब मरीज पहली बार उन्हें देखते हैं, तो थोड़ा हैरान होते हैं। लेकिन जब वे उनकी कहानी सुनते हैं और उनका इलाज देखते हैं, तो उनका दिल सम्मान और विश्वास से भर जाता है। डॉ. गणेश का अगला सपना पीडियाट्रिक्स (बाल रोग) में विशेषज्ञता हासिल करना और अपने परिवार के लिए एक पक्का घर बनाना है।
संकल्प के आगे छोटी पड़ गई हर रुकावट
डॉ. गणेश बरैया की यह कहानी हमें सिखाती है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो कोई भी शारीरिक अक्षमता या सामाजिक रुकावट आपके सपनों को नहीं रोक सकती। जिस बच्चे को कभी सर्कस में भेजने का प्रयास किया गया था, आज वही बच्चा एप्रन पहनकर और गले में स्टेथोस्कोप डालकर सैकड़ों लोगों की जान बचा रहा है।

