बिना मिट्टी और कम पानी से उगाई जा रही आर्गेनिक फसल, खेती की ये नई तकनीक है बेहद खास!


कुछ दिनों पहले एक प्रतिष्ठित अखबार में एक युवा आंत्रप्रन्योर की काफी दिलचस्प कहानी छपी थी। खबर के मुताबिक 22 साल के युवा ऋषभ को B12 और D3 की कमी हो गई। डॉक्टर्स ने कुछ सप्लीमेंट्स लिख दिए, इसी बीच उन्हें मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए विदेश जाना पड़ा। उन्होंने दवाईयों को अपनी यात्रा और नई जगह पर शिफ्ट होने तक के लिए रोक दिया। जल्द ही ऋषभ अपनी दवाईयों के बारे में भूल गए, दिलचस्प बात ये रही कि उन्हें पहले जैसी हेल्थ से जुड़ी परेशानियां अब नहीं हो रही थी, लेकिन भारत लौटने पर उन्हें फिर से B12 और D3 की कमी हो गई। इस बात पर जब ऋषभ ने गौर किया तब उन्हें ये समझ में आया कि ऑस्ट्रेलिया में जिन सब्जियों को ऋषभ खा रहे थे उनमें पर्याप्त मात्रा में मिनरल्स और विटामिन्स शामिल थे, जबकि भारत में पेस्टिसाइड्स का अधिक उपयोग होने के कारण नेचुरल मिनरल-विटामिन उनके खाने से गायब थे, यही वजह थी कि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ा। ये कहानी सिर्फ ऋषभ की नहीं थी बल्कि कई युवाओं की है जो इस तरह की कई बीमारियां से कम उम्र में ही परेशान होने लगते हैं।

आर्गेनिक खेती के लिए प्रेरित हुए ऋषभ

ऋषभ बताते हैं कि उन्होंने सोचा कि ऑर्गेनिक खेती से वे लोगों को फ्रेश, पेस्टीसाइड मुक्त सब्जियां उपलब्ध करवा सकते हैं, लेकिन भविष्य में खेती के लिए कम पड़ती जमीन और पानी की समस्या को देखते हुए उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर रिसर्च किया, खेती में हो रहे नए प्रयोग को जानने के लिए कुछ कोर्सेस किए, रिसर्च किया और तब जाकर उन्हें हाइड्रोपोनिक खेती के बारे में कुछ बातें समझ में आई। कि बिना मिट्टी के और कम लागत से ऑर्गेनिक खेती कर सकते हैं। ऋषभ बताते हैं कि फार्म में एक बार में अलग-अलग सब्जियों के 22 हजार पौधे लगाते हैं। उनके फार्म में एक बार 15 से 20 तरह की सब्जियां उगती हैं। इन सब्जियों के बीज हैदराबाद, पुणे और गुड़गांव से मंगवाया जाता है। ऋषभ हाइड्रोपोनिक खेती से इटैलियन बेसिल, चेरी टमैटो, रेड स्विस चार्ड, बेबी पालक, ग्रीन ओरेगेनो, लेट्यूस (अलग-अलग टाइप की), केल, सेलरी, सनफ्लॉवर, रोजमेरी, पास्ले सहित अन्य वैरायटियों की सब्जियां उगाते हैं।

हाइड्रोपोनिक फार्मिंग

हाइड्रोपोनिक में मिट्टी के बिना खेती की जाती है। इसे ही सॉयल-लेस फार्मिंग कहते हैं। इसके लिए जमीन की जरूरत नहीं होती है। इसमें जमीन की जगह पाइप या स्टैंड में प्लांटिंग कर खेती की जाती है। पौधों की जड़ें इसी के भीतर रहती हैं। पौधे को जरूरी मिनरल और विटामिन लिक्विड फॉर्म में पानी के जरिए दिया जाता है। पानी को आरओ मशीन से फिल्टर कर दिया जाता है। हाइड्रोपोनिक खेती की खासियत है कि इसमें कम समय में अच्छा उत्पादन किया जाता है। इस प्रोसेस में पौधों को अलग-अलग जगहों पर रखा जाता है। इस खेती में बीज भी खराब नहीं होती है। इसका पूरा सिस्टम ऑटोमेटेड होता है, इसलिए कहीं से भी बैठकर इसे ऑपरेट किया जा सकता है।

कम पानी में की जाती है हाइड्रोपोनिक फार्मिंग

हाइड्रोपोनिक खेती के जरिए 80 फीसदी पानी की बचत की जा सकती है। इसमें फसलों को बेहद कम पानी की जरूरत होती है। सामान्य खेती के मुकाबले इसमें 20% ही पानी की आवश्यक्ता होती है। इसमें बहुत अधिक स्पेस की अनिवार्यता भी खत्म हो जाती है।

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Dr. Kirti Sisodia

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