Kalpvas is abstinence  :  महाकुम्भ में कल्पवास का महत्व

Kalpvas is abstinence  :  कल्पवास एक धार्मिक तप और व्रत है, जिसे विशेष रूप से महाकुंभ के दौरान किया जाता है। इसके दौरान व्यक्ति अपने जीवन को पूरी तरह से तपस्वी बनाता है और विशेष नियमों का पालन करता है। कल्पवास के नियम इस प्रकार हैं:

पवित्रता का पालन: कल्पवास करने वाले व्यक्ति को शुद्धता और पवित्रता बनाए रखनी होती है। इसमें शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की पवित्रता का ध्यान रखा जाता है।

सादगीपूर्ण जीवन: कल्पवास के दौरान व्यक्ति को अपने जीवन को सादगीपूर्ण रखना होता है। वह अपने जीवन के हर पहलू में संयम रखते हैं।

व्रत और उपवास: कल्पवास के दौरान व्यक्ति विशेष व्रत का पालन करता है, जिसमें अन्न का सेवन नहीं किया जाता या केवल कुछ विशेष आहार पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता है।

स्मरण और पूजा: कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियमित रूप से भगवान के नाम का जप करना और पूजा अर्चना करनी होती है। यह ध्यान और साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

ध्यान और तप: ध्यान, साधना, और तप के माध्यम से व्यक्ति आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करता है। यह समय आत्मविश्लेषण और आत्म-निर्माण का होता है।

व्रति का पालन: कल्पवास के दौरान व्यक्ति अपने इच्छाओं, संवेदनाओं और व्यवहारों पर पूरी तरह नियंत्रण रखता है। यह समय तामसी और राजसी प्रवृत्तियों से दूर रहने का होता है।

साधना की अवधि: कल्पवास का समय एक दिन से लेकर 12 वर्षों तक हो सकता है। यह व्यक्ति की शक्ति, समर्पण और धैर्य पर निर्भर करता है।

ध्यान और साधना की विशेष विधि: इस दौरान साधक को गंगा स्नान करने और हरिद्वार या प्रयागराज जैसे पवित्र स्थलों पर जाकर साधना करने की परंपरा है।

सामान्यत: पौष माह के 11 वें दिन से लेकर माघ माह के 12 वें दिन तक कल्पवास किया जाता है, जो एक मासिक अवधि है। हालांकि, मकर संक्रांति (14 जनवरी) से लेकर पूरे माघ महीने तक भी बहुत से श्रद्धालु कल्पवास करते हैं। महाकुम्भ में इस वर्ष 13 जनवरी से कल्पवास का आरंभ किया गया है. इसमें 21 कठिन नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। ये नियम व्यक्ति की आत्म-शुद्धि और तप की प्रक्रिया को और भी सशक्त बनाते हैं। कल्पवास 12 फरवरी तक चलेगा।

Positive सार

कल्पवास का मुख्य उद्देश्य आत्म-शुद्धि और भगवान के प्रति समर्पण होता है। कल्पवासियों के जीवन में तप, साधना, और धार्मिक क्रियाओं का विशेष महत्व होता है। इसे भौतिक और मानसिक शुद्धता प्राप्त करने के एक उपयुक्त समय के रूप में देखा जाता है। यह व्यक्ति को अपने जीवन में अध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करता है।

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