समाज के लिए ‘बेचारी लड़की’ बनी भारत की पहली महिला ब्लेड रनर



मंजिल उन्ही को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है। ऐसी ही कहानी है पैरा एथलीट किरन कनोजिया की जिनकी हिम्मत लड़कियों के लिए मिसाल तो है ही युवाओं के लिए भी किसी प्रेरणा से कम नही है।

पिता कपड़ों में प्रेस करने का काम करते थे, लेकिन सपना था बच्चों को पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाने का। बड़ी बेटी ने खुद के बूते इंफोसिस जैसी कंपनी तक पहुंचकर उनके सपने को पूरा किया, तो परिवार में एक अरसे बाद खुशियां आईं। लेकिन, बर्थडे से एक दिन पहले चलती ट्रेन में लूटपाट की वारदात के दौरान वह ट्रैक पर गिर गईं, जिससे उन्होंने अपना एक पैर खो दिया। समाज उन्हें ‘बेचारी लड़की’ की नजर से देखे, यह उन्हें मंजूर नहीं था।

उन्होंने एक बार फिर से खड़े होने, भागने और अपनी किस्मत को खुद से लिखने का फैसला कर लिया और बन गईं इंडिया की पहली फीमेल ब्लेड रनर। आज वह मैराथन में दौड़ती हैं, स्विमिंग, साइकलिंग करती हैं और दूसरों की जिंदगी में उम्मीद की किरन बिखेरती हैं।

ट्रेन में बदमाशों ने लूटीं बर्थडे की खुशियां

वे हैदराबाद से फ़रीदाबाद आने के लिए ट्रेन में सफ़र कर रही थी जब कुछ लड़कों ने उनका सामान छीनना चाहा और खींचतान में वे ट्रेन से गिर गईं और उनका पैर रेलवे ट्रैक की पटरियों में फंस गया. नतीजा उनकी एक टांग डॉक्टरों को काट देनी पड़ी |

बर्थडे के दिन मिला दोबारा जन्म, स्ट्रगल का नया दौर

एक टांग कट जाने के बाद किरण निराश ज़रूर हुईं लेकिन उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा. टांग कटने के बाद उनकी प्रतिक्रिया थी, “मुझे लगा कि जन्मदिन पर फिर नया जन्म मिला है”

आर्टिफ़िशियल यानी कृत्रिम टांग के सहारे किरण ने फिर से ज़िंदगी के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चलने की कोशिश शुरू कर दी और ज़िंदगी को नई दिशा देने की ठानी |

जहाँ चलने में भी परेशानी थी, वही लड़की भारत में मैराथन दौड़ने लगी और कहलाई भारत की महिला बलेड रनर।

नई दिशा

अब किरण लगातार मैराथन दौड़ती हैं। इस सब में उन्हें पिता और अपनी कंपनी इंफ़ोसिस का काफ़ी साथ मिला। किरण बताती हैं कि कृत्रिम टाँग उन्हें कंपनी की ओर से ही मिली।

दुर्घटना के बाद जब किरण पहली बार दफ़्तर लौटीं तो किरण के शब्दों में उनके दोस्तों की प्रतिक्रिया कुछ यूँ थी, “जब मैं ऑफ़िस में गई तो लोगों ने कहा कि तुम तो बिल्कुल नॉर्मल लग रही हो. हमें लगा कि तुम छड़ी के सहारे गिरती-लटकती आओगी. तुम्हें देखकर हमारी इच्छा शक्ति और दृढ़ हो गई है।”

ब्लेड रनर बनने के बाद किरण की ज़िंदगी को नई दिशा मिली है।

किरण बताती हैं, “मैं ज़िंदगी में शायद भूल गई थी कि मैंने जन्म क्यों लिया है और ज़िंदगी का क्या मक़सद है। लेकिन अब मुझे ज़िंदगी जीने का जज़्बा मिल गया है। मैं अपने काम के साथ साथ समाज के लिए भी कुछ कर रही हूँ।”

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Dr. Kirti Sisodia

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