बादल से जुड़कर आदिम कला और संस्कृति को नया रूप दे रहे हैं आदिवासी कलाकार, मिल चुकी है संगीत कला विश्वविद्यालय से मान्यता



समृद्ध आदिम संस्कृति, प्राकृतिक खूबसूरती, विविधताओं से भरी बोली-भाषा, लोकनृत्य, साहित्य और शिल्पकला बस्तर को पूरी दुनिया में एक अलग पहचान देती है। इन्हें पीढ़ी-दर पीढ़ी जीवंत बनाए रखना, देश-दुनिया से इनका परिचय करवाने के उद्देश्य से बादल यानी की बस्तर अकादमी फाॅर-आर्ट लिटरेचर एंड लेंग्वेज की स्थापना की गई है।

बस्तर अकादमी फाॅर डाॅस आर्ट लिटरेचर एंड लेंगवेज (बादल)

छत्तीसगढ़ी बस्तरिया आदिवासी कला की विविधता अक्सर रोमांच से भरी हुई रही है। यहां का वनवासी जीवन और ट्राइबल लाइफस्टाइल ने हर किसी को अपनी ओर आकर्षित किया है। लेकिन अब बस्तर कलेक्टर और जिला प्रशासन की पहल पर बादल अकादमी की स्थापना इन आदिवासी संस्कृतियों को सहेजने का काम कर रही है जिससे आदिवासी युवा अपने कल्चर को सहेज कर रख सकेंगे।
इसके पहले चरण में पर्यटन विभाग के खंडहर हो चुके आसना में बनें अनुपयोगी मोटल का चयन किया गया, जहां अकादमी की स्थापना की जा सके। इसका क्षेत्रफल लगभग दो एकड़ था, लेकिन राजस्व एवं दूसरी जमीन को मिलाकर इस लगभग पांच एकड़ जमीन तैयार की गई। जमीन मिलने के बाद बस्तर अकादमी फाॅर डाॅस आर्ट लिटरेचर एंड लेंगवेज (बादल) अपने मूर्त रूप में स्थापित हुआ। इस अकादमी में प्रमुख रूप से लोकगीत एवं लोक नृत्य प्रभाग, लोक साहित्य प्रभाग, भाषा प्रभाग और बस्तर शिल्प कला प्रभाग शामिल हैं।

लोक गीत एवं लोक नृत्य डिपार्टमेंट

इसमें बस्तर के सभी लोक गीत, लोक नृत्य गीत का संकलन, म्यूजिक कंपोजिंग, फिल्मांकन, प्रदर्शन और नई पीढ़ी को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जिसमें गंवर सिंग नाचा, डण्डारी नाचा, धुरवा नाचा, परब नाचा, लेजागीत, मारीरसोना, जगार गीत मुख्य रूप से सिखाए जाते हैं।

लोक साहित्य डिपार्टमेंट

इसमें बस्तर के सभी समाज के धार्मिक रीति, सामाजिक ताना बाना, त्यौहार, कविता मुहावरा आदि का संकलन, लिपिबद्ध कर दुनिया तक इसे पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

भाषा डिपार्टमेंट

इसके तहत् बस्तर की प्रसिद्ध बोली हल्बी, गोंडी, धुरवी और भतरी बोली का स्पीकिंग कोर्स तैयार कर लोगों को इन बोली का प्रशिक्षण मिल रहा है।

बस्तर शिल्प कला डिपार्टमेंट

इसी तरह बस्तर की शिल्प कलाओं में काष्ठकला, धातु कला, बांसकला, जूटकला, तुम्बा कला आदि का प्रदर्शन एवं निर्माण कला सिखाया जा रहा है।

जनजातीय संस्कृति के केन्द्र के रुप में प्रसिद्ध बस्तर के लोक नृत्य, स्थानीय बोलियां, साहित्य एवं शिल्पकला के संरक्षण और संवर्धन में आज शुरू हुई बस्तर एकेडमी ऑफ डांस, आर्ट एंड लैंग्वेज (बादल) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। 5 करोड़ 71 लाख रुपए की लागत से बनी ये एकेडमी बस्तर की संस्कृति को नई ऊंचाई दे रही है।

बादल एकेडमी के जरिए बस्तर की विभिन्न जनजातीय संस्कृतियों को एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक हस्तान्तरण करना, बाकी देश-दुनिया को इनका परिचय कराना, शासकीय कार्यों का सुचारु सम्पादन के लिए यहां के मैदानी कर्मचारी-अधिकारियों को स्थानीय बोली-भाषा का प्रशिक्षण देने का कार्य भी किया जा रहा है।

संगीत विश्वविद्यालय से मिली मान्यता

बादल एकेडमी और इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय के मध्य एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया गया, जिसके तहत इंदिरा कला एवं संगीत विश्वविद्यालय द्वारा बादल एकेडमी में लोक नृत्य और लोक संगीत के लिए साझा तौर पर कार्य शुरू हो चुका है। विश्वविद्यालय द्वारा बादल एकेडमी को मान्यता प्रदान करते हुए अपने पाठ्यक्रमों से संबंधित विधाओं का संचालन सुचारू रूप से हो रहा है।

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Dr. Kirti Sisodia

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