हम मानते हैं कि हम सोच-समझकर फैसले लेते हैं…पर सच थोड़ा असहज है

ज़्यादातर फैसले हम पहले ही ले चुके होते हैं,

बस बाद में उन्हें “सही” साबित करने की कहानी लिखते हैं।

पहले से बना मन… अदृश्य दिशा

आप जब मोबाइल खरीदने निकलते हैं,

तो क्या सच में दुकान पर जाकर तय करते हैं?

या फिर…

ब्रांड पहले से तय,

रंग पहले से तय,

बजट भी लगभग तय।

दुकान पर जाकर हम विकल्प नहीं देखते,

हम अपने “तय किए हुए चुनाव” को मजबूत करने के सबूत ढूँढते हैं।

तो असली सवाल ये नहीं कि आपने क्या चुना…

सवाल ये है कि आपने कब चुन लिया था—बिना जाने।

यही खेल रिश्तों में भी चलता है

रिश्ते अचानक नहीं टूटते…

वो धीरे-धीरे “तय” हो जाते हैं।

जब हम किसी से नाराज़ होते हैं,

तो हम सच नहीं देखते—

हम “सबूत” देखते हैं।

हमें वही गलतियाँ दिखती हैं,

जो हमारे गुस्से को सही ठहराएँ।

हमें वही बातें याद रहती हैं,

जो हमें चोट पहुँचाएँ।

और सामने वाले की कोशिशें?

वो हमारी कहानी में फिट नहीं बैठतीं…

इसलिए हम उन्हें देखना ही बंद कर देते हैं।

फिर एक दिन हम कहते हैं—

“अब ये रिश्ता नहीं चल सकता।”

लेकिन सच ये है—

वो रिश्ता उस दिन नहीं टूटा…

वो तो बहुत पहले, हमारे मन में खत्म हो चुका था।

दूसरा मौका क्यों नहीं देते?

क्योंकि फैसला हो चुका होता है।

और एक बार मन निर्णय ले ले,

तो दिमाग रास्ते नहीं ढूँढता—

वो दीवारें बनाता है।

हम बातचीत नहीं करते,

हम बहस करते हैं।

हम समझना नहीं चाहते,

हम जीतना चाहते हैं।

हम सुधारना नहीं चाहते,

हम खत्म करना आसान समझते हैं।

क्या सच में ये हमारे फैसले होते हैं?

या हमें सिखाए गए होते हैं?

समाज, विज्ञापन, कहानियाँ—

सब मिलकर हमारे अंदर एक “आदर्श दुनिया” बना देते हैं।

कैसा होना चाहिए एक रिश्ता…

कैसा दिखना चाहिए प्यार…

कैसा होना चाहिए एक “परफेक्ट” इंसान…

धीरे-धीरे हम उस नकली मापदंड को सच मान लेते हैं।

और फिर…

अगर हमारा रिश्ता उस साँचे में फिट नहीं बैठता—

तो हमें लगता है, इसमें कमी है।

भले ही वो रिश्ता

अपने तरीके से बिल्कुल सच्चा और अच्छा क्यों न हो।

हम देख क्या रहे हैं—सच या दिखाया हुआ?

हमें वही अच्छा लगता है, जो हमें बार-बार दिखाया जाता है।

हमें वही सही लगता है, जो हमें बार-बार बताया जाता है।

और फिर…

हम वही चुनते हैं,

जो हमने “सोचकर” नहीं—

बल्कि “सीखकर” तय किया होता है।

इस पूरे सफर में…

हम अपनी असली सोच, अपने अनुभव—सब पीछे छोड़ देते हैं।

तो अब क्या किया जाए?

शुरुआत बहुत बड़ी नहीं होती…

बस थोड़ी सी “जागरूकता” से होती है।

 • एक पल रुककर खुद से पूछें—

क्या मैं सच में देख रहा हूँ, या सिर्फ साबित कर रहा हूँ?

 • सुनना सीखें…

जवाब देने के लिए नहीं, समझने के लिए।

 • अपने विचारों से सवाल करें—

ये मेरी सोच है, या मुझे दी गई सोच है?

 • और सबसे ज़रूरी…

हर फैसला तुरंत लेना ज़रूरी नहीं होता।

आख़िरी बात…

हमारे फैसले अचानक नहीं होते—

वो धीरे-धीरे बनते हैं,

हमारी धारणाओं, अनुभवों और बाहरी प्रभावों से।

गलती फैसले लेने में नहीं है…

गलती है,

बिना देखे, बिना समझे—उन्हीं पर अड़े रहने में।

अगर हम थोड़ा ठहर जाएँ,

थोड़ा सच में देखने लगें—

तो हम सिर्फ बेहतर फैसले ही नहीं लेंगे,

बल्कि रिश्तों को भी बचा पाएँगे—

उन्हें समझकर, समय देकर…

और सच में “विकल्प” देखकर।

क्योंकि कभी-कभी…

सबसे सही फैसला वही होता है,

जो हमने पहले से तय नहीं किया होता।

डॉ कीर्ति सिसोदिया

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Dr. Kirti Sisodia

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