- नक्सलवाद का अंत
- अमित शाह का लोकसभा में कड़ा संदेश
Naxal-Free India: लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का संबोधन केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा और बदलते बस्तर की एक नई तस्वीर थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि देश अब नक्सलवाद के दंश से लगभग मुक्त हो चुका है। शाह ने दो-टूक कहा, “जो हथियार उठाएगा, उसका हिसाब चुकता होगा।” उनके इस संबोधन ने न केवल सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को दर्शाया, बल्कि पिछली सरकारों की विफलताओं पर भी तीखे सवाल खड़े किए।
बस्तर, विकास की रोशनी तक
अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि आज वहाँ नक्सलवाद अंतिम सांसे ले रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि दशकों तक बस्तर विकास की मुख्यधारा से इसलिए कटा रहा क्योंकि वहाँ ‘लाल आतंक’ की गहरी परछाई थी। मोदी सरकार के आने के बाद इस परछाई को हटाने का काम युद्ध स्तर पर किया गया।
गृह मंत्री ने विकास के आंकड़े पेश करते हुए बताया कि बस्तर के हर गाँव में अब स्कूल बनाए जा रहे हैं और राशन की दुकानें खोली जा रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि 2014 के बाद जब पूरे देश के गरीबों को घर, गैस, पानी और मुफ्त अनाज मिल रहा था, तब बस्तर के आदिवासी इन सुविधाओं से महरूम क्यों थे? शाह के अनुसार, नक्सलवाद ने विकास के पहिये को जाम कर रखा था, जिसे अब तोड़ दिया गया है।
गरीबी बनाम विचारधारा
नक्सलवाद की जड़ें
अमित शाह ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण वैचारिक बिंदु पर अपनी बात रखी। उन्होंने इस प्रचलित धारणा को खारिज कर दिया कि नक्सलवाद गरीबी के कारण पनपा। शाह ने कहा, “नक्सलवाद गरीबी के कारण नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद के कारण इन क्षेत्रों में गरीबी रही।”
उनके अनुसार, यह पूरी तरह से एक वैचारिक लड़ाई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि है और किसी भी अन्याय का समाधान हथियार उठाना नहीं हो सकता। उन्होंने नक्सलियों की तुलना शहीद भगत सिंह या भगवान बिरसा मुंडा से करने वालों को आड़े हाथों लिया और इसे ‘अक्षम्य’ बताया। शाह ने याद दिलाया कि वे महापुरुष विदेशी शासन के खिलाफ लड़े थे, जबकि नक्सली अपने ही देश के संविधान और निर्दोष नागरिकों के खिलाफ हथियार उठा रहे हैं।
इतिहास और पिछली सरकारों पर हमला
गृह मंत्री ने नक्सलवाद के इतिहास को खंगालते हुए बताया कि इसकी शुरुआत 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी। 1971 में ही हिंसा की 3620 घटनाएं दर्ज की गई थीं। उन्होंने कांग्रेस पर कटाक्ष करते हुए कहा कि 1970 से 2004 के बीच (केवल 4 साल छोड़कर) देश में कांग्रेस का शासन रहा, फिर भी यह समस्या खत्म होने के बजाय महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में फैलती गई।
उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने माओवाद को देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बताया था, लेकिन शाह ने आरोप लगाया कि उस समय ठोस कार्रवाई की कमी रही।
‘गोली का जवाब गोली से’
एक नया भारत
शाह ने स्पष्ट किया कि वर्तमान सरकार डरने वाली नहीं है। उन्होंने कहा कि न्याय सभी के साथ होगा, लेकिन जो लोग हिंसा का रास्ता चुनेंगे, उन्हें उसी की भाषा में जवाब मिलेगा। ‘गोली का जवाब गोली से’ देने की यह नीति सुरक्षा बलों के मनोबल को बढ़ाने वाली है।
आज बस्तर समेत देश के अन्य प्रभावित इलाकों में सुरक्षा कैंपों का जाल बिछाया गया है, जिससे नक्सलियों का मूवमेंट सिमट गया है। गृह मंत्री ने विश्वास दिलाया कि माओवादी हिंसा के दिन अब लद चुके हैं और भारत एक नक्सल-मुक्त भविष्य की ओर बढ़ चुका है।
Positive Takeaway
अमित शाह का यह संबोधन सुरक्षा और विकास के बीच के तालमेल को दर्शाता है। जहाँ एक तरफ सड़कों, स्कूलों और अस्पतालों के जरिए आदिवासियों का विश्वास जीता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ हिंसा करने वालों के खिलाफ कठोर सैन्य कार्रवाई जारी है। यह ‘नए भारत’ का वह संकल्प है जहाँ हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है।
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