Shubhanshu Shukla: एस्ट्रोनॉट्स के कैप्सूल समुद्र में ही क्यों उतारे जाते हैं?

Shubhanshu Shukla: शुभांशु शुक्ला की सफल वापसी के साथ एक बार फिर ये सवाल चर्चा में है कि आखिर स्पेस कैप्सूल को हर बार समुद्र में ही क्यों उतारा जाता है? क्या इसकी कोई तकनीकी वजह है या फिर ये बस एक संयोग है? दरअसल, इसके पीछे बहुत सटीक साइंस, गणित और सुरक्षा की सोच छिपी होती है।

स्पेस से धरती पर लौटना आसान नहीं

जब कोई कैप्सूल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से धरती की ओर लौटता है, तो वो लगभग 28,000 किमी/घंटा की रफ्तार से आ रहा होता है। इतनी स्पीड में धरती के वायुमंडल में एंट्री करना किसी बड़े चैलेंज से कम नहीं होता। इस दौरान तापमान, वायुदाब और घर्षण बहुत ज्यादा होता है। इसलिए लैंडिंग के लिए ऐसी जगह चाहिए जो कैप्सूल को झटका न दे और समुद्र का पानी इस काम में परफेक्ट साबित होता है।

पहले से तय होता है Landing Zone

स्पेस मिशन शुरू होने से पहले ही एक मुख्य और एक बैकअप लैंडिंग साइट तय कर ली जाती है। यह प्लानिंग इतनी सटीक होती है कि कैप्सूल के एक सेकंड की भी देरी उसे सैकड़ों किलोमीटर दूर ले जा सकती है। इसलिए स्पेस एजेंसियां पहले से ही मौसम, हवा की दिशा और समुद्र की स्थिति का एनालिसिस करती हैं ताकि किसी भी इमरजेंसी में बैकअप साइट इस्तेमाल की जा सके।

क्यों समुद्र को ही चुना जाता है?

  1. सॉफ्ट लैंडिंग- समुद्र का पानी कैप्सूल को नैचुरल कुशन की तरह सपोर्ट देता है।
  2. कम आबादी वाला एरिया- समुद्र में लैंडिंग से किसी भी मानव बस्ती को खतरा नहीं होता।
  3. शॉक एब्जॉर्बिंग- तेज रफ्तार से आने वाले कैप्सूल को धरती से टकराने पर लगने वाला जोर समुद्र में नहीं लगता।

रिकवरी मिशन होता है आसान

  • समुद्र में कैप्सूल उतारना सिर्फ लैंडिंग के लिए ही नहीं, बल्कि रिकवरी मिशन को आसान बनाने के लिए भी फायदेमंद होता है।
  • स्पेशल शिप्स पहले से तैनात होते हैं जो कैप्सूल को तुरंत पकड़ लेते हैं।
  • इसके बाद हेलिकॉप्टर की मदद से एस्ट्रॉनॉट्स को बाहर लाया जाता है।
  • यह पूरा सिस्टम टेस्टेड और भरोसेमंद है, इसलिए स्पेस एजेंसियां इसी पर काम करती हैं।

कभी जमीन पर भी उतरे हैं कैप्सूल?

हां, रूस का मशहूर Soyuz मिशन एक बार रेगिस्तान में उतारा गया था, और वह भी सफल रहा। लेकिन इस केस के बाद ज़्यादातर स्पेस एजेंसियों ने मान लिया कि समुद्र की लैंडिंग ज्यादा सेफ, आसान और प्रैक्टिकल है।

भारत के लिए गर्व का पल

शुभांशु शुक्ला की 18 दिन की स्पेस यात्रा न केवल भारत के लिए ऐतिहासिक रही, बल्कि अंतरिक्ष में भारतीयों की नई मौजूदगी का प्रमाण भी बनी। उनकी वापसी ड्रैगन कैप्सूल के ज़रिए कैलिफ़ोर्निया के समुद्र में हुई, https://www.youtube.com/watch?v=g8a_wdZ869w&t=219sजो बताता है कि कैसे विज्ञान और रणनीति एक साथ मिलकर हर मिशन को सक्सेसफुल बनाते हैं।

एक साइंटिफिक प्लान

तो अगली बार जब आप सुनें कि कोई कैप्सूल समुद्र में उतरा, तो समझ जाइए कि इसके पीछे गहरी साइंस, महीनों की तैयारी और सुरक्षा की ठोस रणनीति छिपी है। यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि सोच-समझकर लिया गया सबसे सुरक्षित फैसला होता है।

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Rishita Diwan

Content Writer

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