भारत का शक्तिपीठ जहां चलता है 9 दिनों का रथ उत्सव!

भारत विविधताओं और मान्यताओं का देश है। यहां त्यौहारों के माध्यम से जीवन में उत्सव के रंग दिखाई देते हैं। नवरात्रि भी ऐसे ही त्यौहारों में से एक है जो मां दुर्गा को समर्पित शक्ति और ऊर्जा का एक रूप है। नवरात्रि के 9 दिन देवी शक्ति की पूजा विधान पूरे देश में अलग-अलग तरह से होती है। जो आराध्य महाशक्ति के समर्पण के साथ आश्चर्य का भी अहसास होता है। इस पर्व को मनाने की एक अनोखी परंपरा जाजपुर की मां बिरजा देवी शक्तिपीठ में भी दिखाई देती है।

नवरात्रि में मनाया जाता है रथ उत्सव

जगन्नाथ पुरी से 110 किमी दूरी पर स्थित है जाजपुर, जहां मां बिरजा देवी शक्तिपीठ है। कहते हैं मां बिरजा अपने पूर्ण ब्रह्मांडीय त्रिमूर्ति रूप त्रिशक्ति यानी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में जाजपुर में प्रतिष्ठित हैं। मंदिर के सिंह द्वार पर हजारों श्रद्धालु मां बिरजा के रथ को खींचने के लिए पहुंचते हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी के अनुसार यहां नवरात्रि के 9 दिन रथ उत्सव मनाया जाता है। जो इस शक्तिपीठ के विशेष आकर्षण में से एक है। पूरी दुनिया में मां बिरजा एक मात्र शक्तिपीठ है, जहां पूरे नौ दिन रथ उत्सव मनाते हैं।

जानकारों का ये भी कहना है कि भगवान विष्णु के दशावतार के जन्मदिन यानी कि भाद्र मास की द्वादशी से मंदिर के विश्वकर्मा रथ का निर्माण कार्य शुरू करते हैं। अमावस्या की रात्रि पूरे विधि विधान से रथ के अधिवास का अनुष्ठान होता है और  नवरात्रि के पहले दिन मां का प्रतिष्ठा उत्सव मानाया जाता है। मान्यता ये है कि दक्षिण दिशा में दुष्टों के देवता विराजित हैं। देवी दुर्गा इन दुष्टों का संहार करके लोगों के डर को दूर करती हैं। अष्टमी पर मंदिर के निकट एक वट वृक्ष के प्रांगण में मां की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

क्योंकि मंदिर को तंत्र साधना का केंद्र माना गया है इसलिए यहां नवमी पर बलि चढ़ाने की परंपरा है। इसके साथ ही मध्य रात्रि में यहां गुप्त पूजा की जाती है। आम लोगों के लिए इन पूजा को देखना मना है। नवमी के बाद मां मंदिर में वापस प्रवेश करती हैं और रथ को विसर्जित कर दिया जाता है।

शिव करते हैं मंदिर की रक्षा

वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है ये शक्तिपीठ। इस मंदिर की आकृति त्रिकोणीय है। त्रिकोण के केंद्र में मां दुर्गा विराजित हैं और त्रिकोण पर भगवान शिव हैं। मंदिर में सबसे पहले देवी के वाहन सिंह से होती है, जो एक शिला स्तंभ पर है। मंदिर का निर्माण ओडिया मंदिर वास्तु शैली में हुआ है। हर दिन यहां औसतन 20 हजार से ज्यादा लोग इस समय पहुंचते हैं।

प्राचीन परंपराओं और रहस्यमय मान्यताओं से परिपूर्ण है यह शक्तिपीठ जो ये अहसास करवाता है कि भारतीय संस्कृति, परंपराएं और मान्यताएं हर व्यक्ति से किस तरह जुड़ी हुई हैं। जहां पर कई तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों के बावजूद हमारा विश्वास विशाल और मजबूत वृक्ष की जड़ की तरह अडिग है।

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Rishita Diwan

Content Writer

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