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PADMSHREE RAHIBAI POPARE: देसी बीज के 154 किस्मों का संरक्षण करने वाली ‘SEED MOTHER’ की प्रेरणादायी कहानी!

by admin

Date & Time: Nov 13, 2021 1:08 PM

Read Time: 2 minute


ह हैं महाराष्ट्र की राही बाई पोपरे, तन पर चटक लाल रंग की नव्वारी साड़ी और चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान के साथ पद्मश्री सम्मान ले रहीं राहीबाई पोपरे ‘Seed Mother’ के नाम से जानी जाती हैं। राहीबाई पोपरे इस साल उन 145 लोगों में शामिल हैं जिन्हें लीक से हटकर काम करने के लिए पद्म सम्मान से सम्मानित किया गया है। बीज संरक्षण, पारंपरिक खेती को बढ़ावा देने और कृषि तकनीक की गुणवत्ता को सुधारने के क्षेत्र में उनका कार्य अतुलनीय है।

बीज संरक्षण और पारंपरिक खेती की जड़ों को संभाल रही हैं ‘Seed Mother’
61 वर्षीय राहीबाई महाराष्ट्र के एक छोटे से आदिवासी गांव में रहती हैं। उन्होंने स्वदेशी बीजों के संरक्षण के काम को एक आंदोलन की तरह शुरू किया। इस काम को करते हुए उन्हें लगभग 20 साल हो चुके हैं। वह कहती हैं कि- उनका गांव काफी छोटा है और गांव के ज्यादातर लोग खेती-किसानी करके अपना जीवन चला रहे हैं। किसान अपनी आय को बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों, उर्वरकों का भारी मात्रा में उपयोग कर रहे थे।
राहीबाई रासायनिक खाद से होने वाले नुकसान को अच्छे से समझती थीं और इसीलिए उन्होंने खेती के पुराने तरीकों की ओर कदम बढ़ाने का फैसला लिया। उन्होंने 154 देशी किस्मों के बीज का संरक्षण किया है। जिन बीजों का वे संरक्षण कर रही हैं उन्हें उगाने के लिए केवल पानी और हवा की जरूरत होती है। उन्होंने बीजों के संरक्षण की यह तकनीक अपने पिता से सीखी थी।


बीजों को संरक्षित करने के शुरूआती दौर में लोगों को उनका काम बेकार या समय की बर्बादी लगता था। कुछ लोग उन्हें पागल समझकर उनका मजाक भी उड़ाते थे। लेकिन जब उनके काम को सरकार ने समझा और उन्हें सम्मान मिलने लगा तब लोगों को यह समझ में आया कि कृषि और पर्यावरण की बेहतरी के लिए उनका काम कितना महत्वपूर्ण है। आज अपनी काम की वजह से ही राहीबाई पोपरे Seed Mother के नाम से जानी जाती हैं।

किसानों और छात्रों को दे रही हैं प्रशिक्षण
पोपरे ने जो कुछ भी अपने आस-पास सीखा था उन पर अमल कर आज वह समाज के लिए काफी अच्छा काम कर रही हैं। अब राहीबाई पोपरे किसानों और छात्रों को बीज का चुनाव, मिट्टी की उर्वरता और कीट प्रबंधन में सुधार के लिए पारंपरिक तरीकों का उपयोग करना सीखा रही हैं। वह किसानों को देसी फसलों की पौध देती हैं जिससे उन्हें देसी किस्मों की परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है। उनका मानना है कि फसल उत्पादन के पारंपरिक तरीकों के उपयोग से फसल उत्पादन को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से काफी हद तक बचाया जा सकता है। कृषि और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में दिया जा रहा उनका योगदान काफी प्रेरणादायी है।

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