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अनसुनी गाथा

झलकारी बाई: कहानी उस वीरांगना की जिनके शौर्य में थी रानी लक्ष्मीबाई जैसी चमक!

by admin

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मध्यप्रदेश का झांसी अपनी कीर्ति का बखान खुद ही करता है। यहां के मिट्टी में शौर्य की खुशबू आती है। जिसकी वजह हैं, वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई, वह वीरांगना जिन्होंने वीरता की एक मिसाल कायम की है। लेकिन झांसी में एक और क्रांतिकारी का नाम बड़े अदब से लिया जाता है, जिनके बारे में ज़्यादा लिखा-पढ़ा नहीं गया है। और वो हैं झलकारी बाई।

साहस की एक नई ही परिभाषा गढ़ने वाली झलकारी बाई का जन्म बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव में हुआ। उनके पिता सदोवा और माता जमुनाबाई कोली जाति से संबंध रखते थे। बचपन से ही साहसी झलकारी के बारे में यह कहा जाता है कि एक बार जंगल में झलकारी बाई का सामना बाघ से हुआ था और नन्हीं झलकारी ने उसका डटकर सामना किया।

झलकारी का विवाह झांसी की सेना में सिपाही रहे पूरन कोली के साथ हुई। और वे अपने पति के साथ झांसी आ गईं। बात 1857 की क्रांति की है। जब रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए महिलाओं को भी युद्ध विद्या में निपुण कर रही थीं। यहीं झलकारी बाई लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में शामिल हो गईं। और उनकी वीरता के चलते उन्हें महिला शाखा दुर्गा दल का सेनापति बनाया गया।

इतिहास में एक किस्सा काफी दिलचस्प है, कि जब रानी लक्ष्मीबाई ने पहली बार झलकारी बाई को देखा तो वे हैरान रह गईं। क्योंकि झलकारी बाई हूबहू रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखती थीं। और यही बात रानी लक्ष्मीबाई के लिए काफी मददगार साबित हुई।

अंग्रेजों को धोखा देने के लिए झलकारी बाई, रानी लक्ष्मीबाई के वेश में युद्ध किया करती थीं। 1857 की क्रांति की आंच जब झांसी पर पड़ी तब रानी लक्ष्मीबाई की सेना ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। लेकिन एक समय ऐसा आया जब अंग्रेज झांसी पर हावी हो गए। तब झलकारी बाई ने रानी लक्ष्मीबाई से कहा, कि वे बच्चों को लेकर किले से निकल जाएं। उन्होंने रानी को समझाया कि युद्ध में उनके नेतृत्व की जरूरत है। और वे झांसी से बाहर निकलकर इस युद्ध को जारी रख सकती हैं।

रानी लक्ष्मीबाई ने झलकारी बाई की बात मानी और किले से निकल गईं। इस समय झलकारी बाई को ही अंग्रेज रानी लक्ष्मीबाई समझ रहे थे। और झांसी की सेना उनके नेतृत्व में ही अंग्रेजों से लड़ रही थी। वे अंग्रेज़ों से ऐसे लड़ीं कि उन्हें इस धोखे का यकीन ही नहीं हुआ। जब झांसी की सेना हार के कगार पर थी जब जनरल रोज़ के सामने वे निडर होकर खड़ी हो गईं। तब तक रानी लक्ष्मीबाई किले से बाहर जा चुकी थीं। अंग्रेजों को इस बात का पता चला कि झलकारी बाई रानी लक्ष्मी बाई बनकर लड़ रही थीं तो अंग्रेजों ने उन्हें तोप से उड़ा दिया। और झलकारी बाई हंसते हुए देश के लिए शहीद हो गईं। आज भी झलकारी बाई की कहानी बुंदेलखंड की लोककथाएं और लोकगीतों में जिंदा हैं।



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