- Jhalmala Mata Mandir
- झलमला की गंगा मइया
- तालाब से निकली वो मूरत जिसे अंग्रेज अफसर भी न हिला सके
Jhalmala Mata Mandir: छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित माँ गंगा मइया मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अटूट आस्था और ऐतिहासिक चमत्कारों का केंद्र है। झलमला गांव में स्थित इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। मान्यता है कि यहाँ जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से आता है, माता उसकी झोली खुशियों से भर देती हैं। इस मंदिर का इतिहास लगभग 130 साल पुराना है, जो ब्रिटिश काल के संघर्ष और दैवीय शक्ति की विजय गाथा सुनाता है।
तालाब की खुदाई और माता का प्राकट्य
मंदिर की उत्पत्ति की कहानी बेहद दिलचस्प है। सवा सौ साल पहले जब बालोद की जीवनदायिनी तांदुला नदी पर नहर का निर्माण कार्य चल रहा था, तब झलमला एक छोटा सा गांव हुआ करता था। सोमवार के बाजार में आने वाले पशुओं और ग्रामीणों के लिए पानी की भारी कमी होने लगी। इस कमी को दूर करने के लिए ‘बांधा तालाब’ की खुदाई शुरू की गई।
कथा के अनुसार, सिवनी गांव का एक केवट इस तालाब में मछली पकड़ने गया था। उसके जाल में मछली के बजाय एक पत्थर की प्रतिमा फंस गई। केवट ने इसे साधारण पत्थर समझकर वापस पानी में फेंक दिया। लेकिन उसी रात गांव के एक बैगा (पुजारी) को माता ने सपने में दर्शन दिए और कहा, “मैं जल के भीतर हूँ, मुझे बाहर निकालो और मेरी प्राण-प्रतिष्ठा कराओ।” अगली सुबह ग्रामीणों की मौजूदगी में फिर से जाल फेंका गया और वही दिव्य प्रतिमा फिर से प्रकट हुई।
जब हार गया अंग्रेज अफसर एडम स्मिथ
इस मंदिर का एक सिरा ब्रिटिश इतिहास से भी जुड़ता है। कहा जाता है कि जब अंग्रेज शासन के दौरान यहाँ नहर का निर्माण किया जा रहा था, तब यह प्रतिमा मार्ग में बाधा बन रही थी। अंग्रेज अफसर एडम स्मिथ ने इस प्रतिमा को वहां से हटाने का आदेश दिया। मजूदरों और मशीनों की तमाम कोशिशों के बाद भी प्रतिमा टस से मस नहीं हुई। अंततः हार मानकर अंग्रेजों को अपना रास्ता बदलना पड़ा और माता की शक्ति के आगे सिर झुकाना पड़ा। आज भी यह घटना माता के प्रति लोगों के विश्वास को और गहरा करती है।
श्रद्धा का केंद्र
मुंडन संस्कार और ज्योति कलश
गंगा मइया के दरबार में केवल स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि समूचे छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्यों से भी लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। यहाँ मुंडन संस्कार की विशेष मान्यता है। माना जाता है कि माता के चरणों में बच्चों का पहला मुंडन कराने से उन्हें आरोग्य और सुख की प्राप्ति होती है।
नवरात्रि के पावन अवसर पर मंदिर की छटा निराली होती है। हजारों की संख्या में ‘मनोकामना ज्योति कलश’ प्रज्वलित किए जाते हैं। मंदिर परिसर में भक्तों के लिए एक विशेष ज्योति दर्शन स्थल भी बनाया गया है, जहाँ वे अखंड ज्योत के दर्शन कर पुण्य लाभ कमाते हैं।
चुनौतीपूर्ण काल और आस्था का दीया
हाल के वर्षों में वैश्विक महामारी (कोरोना) के कारण मंदिर के आयोजनों पर प्रभाव पड़ा था। उस कठिन दौर में भी मंदिर प्रशासन ने परंपराओं को जीवित रखा। हालांकि भक्तों का प्रवेश वर्जित था, लेकिन पुजारियों ने विधिवत पूजा-अर्चना की और ज्योति कलश प्रज्वलित किए। आज मंदिर परिसर फिर से अपनी पुरानी रौनक में लौट आया है, जहाँ स्थानीय व्यापारियों का जीवन और भक्तों की आस्था साथ-साथ फल-फूल रही है।
गंगा मइया मंदिर न केवल छत्तीसगढ़ की धार्मिक विरासत का हिस्सा है, बल्कि यह उस कालखंड का गवाह है जहाँ आस्था ने आधुनिक इंजीनियरिंग और विदेशी हुकूमत को भी अपनी शक्ति का अहसास कराया था।

