Chendru Mandavi: मोगली नहीं, ये है बस्तर का चेंदरू!

Chendru Mandavi: जब हम बचपन में मोगली की कहानियाँ सुनते थे, तो लगता था कि ये सिर्फ कल्पना है। लेकिन बस्तर के जंगलों में एक बच्चा वाकई बाघ के साथ बड़ा हुआ – उसका नाम था चेंदरू मंडावी। उसकी कहानी सिर्फ अनोखी नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के रिश्ते की सबसे खूबसूरत मिसाल है।

बाघ से मिली बचपन की सबसे प्यारी दोस्ती

नारायणपुर जिले के गढ़बेंगाल गांव में जन्मा चेंदरू मुरिया जनजाति का सदस्य था। एक दिन उसके शिकारी पिता जंगल से लौटे और बांस की टोकरी में उसे एक अनोखा तोहफा दिया – बाघ का एक बच्चा। चेंदरू ने उसका नाम रखा टेम्बू। फिर दोनों की दोस्ती की शुरुआत हो गई। वे साथ जंगल में घूमते, नदियों में खेलते और टेम्बू को दूध पिलाकर पालते।

कैसे बना चेंदरू स्टार?

चेंदरू और टेम्बू की यह कहानी इतनी खास थी कि स्वीडन के मशहूर फिल्ममेकर अरेन सक्सडॉर्फ खुद बस्तर आ गए। उन्होंने 1 साल गांव में रहकर चेंदरू पर एक फिल्म बनाई – The Jungle Saga। 1957 में रिलीज़ हुई ये फिल्म यूरोप में सुपरहिट रही और चेंदरू बन गया “Tiger Boy of India”।

टाइम मैगजीन पर पहला आदिवासी बच्चा

अरेन की पत्नी और फोटोग्राफर एस्ट्रिड ने चेंदरू की फोटो पर एक किताब भी बनाई – Chendru: The Boy and the Tiger। 1959 में चेंदरू TIME Magazine के कवर पर छपने वाले पहले भारतीय आदिवासी बालक बने। दुनिया भर के लोग बस्तर पहुंचने लगे सिर्फ चेंदरू की एक झलक पाने के लिए।

स्वीडन का सफर और फिर घर वापसी

एक साल तक स्वीडन में रहने के बाद चेंदरू भारत लौटा। यहां उसकी मुलाकात प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से भी हुई। लेकिन गांव में लौटने के कुछ समय बाद टेम्बू की मौत हो गई। चेंदरू टूट गया और धीरे-धीरे फिर सामान्य ग्रामीण जीवन में लौट आया।

स्टारडम से सादगी तक

चेंदरू ने कभी ग्लैमर की दुनिया को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने गांव में ही एक आदिवासी लड़की से शादी की और अपनी संस्कृति के साथ जीवन बिताया। किसी प्रकार का प्रचार नहीं, न कोई दिखावा – सिर्फ सादगी और आत्मसम्मान।

जब भूख ने स्टार को पीछे छोड़ दिया

यह विडंबना ही है कि हॉलीवुड की फिल्म करने वाला चेंदरू अपने जीवन के आखिरी समय में भूख और गरीबी से लड़ता रहा। 2013 में 78 साल की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। लेकिन उनकी कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है।

विरासत जो आज भी जिंदा है

आज रायपुर के जंगल सफारी में चेंदरू और टेम्बू की एक खूबसूरत मूर्ति है, जो इस अनोखी दोस्ती की याद दिलाती है। उनकी कहानी उन सभी बच्चों को एक सिख देती है – दोस्ती सच्ची हो तो शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

अमर है चेंदरू

चेंदरू की कहानी सिर्फ बस्तर की नहीं, यह एक ऐसी गाथा है जो मानव और प्रकृति के सह-अस्तित्व की मिसाल है। वह मोगली नहीं था, वह बस्तर का चेंदरू था – एक असली हीरो।

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Rishita Diwan

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