- Bastar Holi Tradition
- बस्तर की अनूठी होली
- 610 साल पुरानी रियासतकालीन परंपरा और माड़पाल का ऐतिहासिक रथ
Bastar Holi Tradition : छत्तीसगढ़ का बस्तर अपनी जनजातीय संस्कृति और अनोखी परंपराओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है। जहाँ पूरे देश में होली का त्यौहार रंगों और उल्लास के साथ मनाया जाता है, वहीं बस्तर में इसकी शुरुआत एक 610 साल पुरानी ‘रियासतकालीन’ परंपरा से होती है। यहाँ होली केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि आस्था, राजशाही इतिहास और आराध्य देवी दंतेश्वरी के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
610 साल पुराना इतिहास
राजा पुरुषोत्तम देव और जगन्नाथपुरी का संबंध
बस्तर के जानकार कहते हैं, प्राचीन समय में बस्तर में होली नहीं मनाई जाती थी। इस परंपरा की शुरुआत तब हुई जब बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव तीर्थ यात्रा के लिए जगन्नाथपुरी गए थे। वहाँ उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि से नवाजा गया। जब राजा वापस लौटे, तो उस दिन पूर्णिमा थी।
राजा को स्मरण हुआ कि इस दिन होली जलाई जाती है, और तभी से बस्तर की आराध्य देवी दंतेश्वरी की विशेष पूजा-अर्चना के बाद होली जलाने की परंपरा शुरू हुई। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, यह परंपरा लगभग 610 वर्षों से निरंतर चली आ रही है।
बस्तर की ‘पहली होली’
बस्तर की होली का केंद्र बिंदु जगदलपुर के पास स्थित माड़पाल गाँव है। परंपरा के अनुसार, पूरे बस्तर संभाग में सबसे पहली होली माड़पाल में ही जलाई जाती है।
- राज परिवार की उपस्थिति- रात के करीब 11 बजे बस्तर राजपरिवार के सदस्य माड़पाल पहुँचते हैं।
- रथ यात्रा- राजपरिवार के सदस्य 4 पहियों वाले विशेष लकड़ी के रथ पर सवार होकर गाजे-बाजे और आतिशबाजी के साथ होलिका दहन स्थल तक पहुँचते हैं।
- अंगार की परंपरा- पुराने समय में यहाँ से जलती हुई होली की आग (अंगार) लेकर घुड़सवार राजमहल पहुँचते थे, जिसके बाद शहर की अन्य होलिकाएँ जलाई जाती थीं।
तीन साल में बनता है नया रथ
अद्भुत शिल्पकारी
बस्तर की इस होली की एक और विशेषता यहाँ इस्तेमाल होने वाला रथ है।
- निर्माण प्रक्रिया- बस्तर में हर 3 साल में एक बार नया रथ बनाया जाता है। बीच के दो सालों में पुराने रथ की मरम्मत की जाती है और उसमें नई लकड़ी के हिस्से जोड़े जाते हैं।
- अनुष्ठान- होलिका दहन के बाद, राजपरिवार के सदस्य एक ‘हंडी’ (मिट्टी के पात्र) में अग्नि लेकर वापस दंतेश्वरी मंदिर लौटते हैं।
- बलि प्रथा- रथ रात भर दहन स्थल पर ही खड़ा रहता है। अगले दिन गाँव के पुजारी विशेष पूजा-पाठ करते हैं और बकरे की बलि देने के बाद रथ को उसके निश्चित स्थान पर सुरक्षित रख दिया जाता है।
सुख-शांति और लोक कल्याण का प्रतीक
कि माड़पाल की यह होली केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि बस्तर की सुख, शांति और समृद्धि के लिए जलाई जाती है। फागुन मड़ई और इस रियासतकालीन परंपरा को आज भी राजपरिवार पूरी शिद्दत से निभा रहा है। हालांकि, आधुनिक समय में सुरक्षा और भीड़ के कारण अब लोग स्थानीय स्तर पर भी होलिका दहन करने लगे हैं, लेकिन माड़पाल का महत्व आज भी सर्वोच्च है।
बस्तर की होली के मुख्य आकर्षण
| मुख्य स्थान | माड़पाल गाँव, जगदलपुर (बस्तर) |
| आराध्य देवी | माँ दंतेश्वरी और मावली देवी |
| मुख्य पात्र | बस्तर राजपरिवार के सदस्य |
| रथ की आयु | प्रत्येक 3 वर्ष में नया निर्माण |
| ऐतिहासिक काल | रियासत काल (लगभग 610 वर्ष पुराना) |
Positive सार
बस्तर की होली हमें याद दिलाती है कि हमारी जड़ें कितनी गहरी हैं। राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा शुरू की गई यह रस्म आज भी बस्तर के लोगों के लिए आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। रथ, राजशाही परंपरा और देवी भक्ति का यह संगम बस्तर को पूरे भारत में अद्वितीय बनाता है।\
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