Bastar Dussahara: बस्तर में क्यों मनाया जाता है 75 दिनों का दशहरा?

राम, रामायण और रामचरित मानस सदियों से पूरे भारतवर्ष को एकता के सूत्र जोड़े रखी हुई है। पूरा देश इस वक्त नवरात्रि और दशहरे की तैयारियों में लगा हुआ है। देशभर में दशहरा और नवरात्रि भिन्न-भिन्न रूपों में मनाया जाता है उन्ही में से एक है बस्तर दशहरा। लेकिन बस्तर दशहरा बाकि दशहरों से अलग होता है।

आदिम संस्कृति का उत्सव

बस्तर जिसकी ख्याति भारत में उन जगहों में से एक के रूप में है जहां पर आदिवासी संस्कृति, समृद्ध विरासत और खूबसूरत जंगल का संगम है। यहां के रीति-रिवाज को देखकर लगता है मानो ये अलग ही दुनिया है। और यहीं मनाया जाता है भारत में सबसे सबसे लंबे समय तक मनाया जाने वाला बस्तर का दशहरा उत्सव

 बस्तर दशहरा में खास

75 दिनों तक मनाया जाने वाला बस्तर दशहरा सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि परंपरा है जिसकी कहानी शुरू होती है आज से करीब 600 साल पहले, चालुक्य वंश के चौथे राजा पुरूषोत्तम देव ने 1408 ई. में बस्तर दशहरा मनाने की शुरूआत की थी। ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक पुरूषोत्तम देव एक बार जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। तब जगन्नाथ स्वामी ने पुरी के राजा को स्वप्न देकर कहा था कि बस्तर नरेश भक्ति और मित्रता के भाव से पुरी आ रहे हैं। उनका भव्‍य सम्मान किया जाए।

भगवान जगन्नाथ के आदेश पर बस्तर नरेंश को मिला रथ

इसके बाद पुरी के राजा ने बस्तर के राजा का स्वागत किया। ऐसा भी कहा जाता है कि बस्तर के राजा ने पुरी के मंदिरों में एक लाख स्वर्ण मुद्राएं, रत्न आभूषण और बेशकीमती हीरे-जवाहरात अर्पित किए थे। इससे प्रसन्‍न होकर जगन्नाथ स्वामी ने सोलह चक्कों का रथ राजा को प्रदान करने की बात पुजारी से कही थी। आज भी इसी रथ पर सवार होकर बस्तर नरेश और उनके वंशज दशहरा पर्व मनाने पहुंचते हैं। इस घटना की वजह से राजा पुरूषोत्तमदेव को ‘लहुरी रथपति’ की उपाधि से सम्‍मानित किया गया।

रथ परिक्रमा का रहस्य

बस्तर दशहरा में रथ परिक्रमा एक रहस्य है। अश्विन शुक्ल पक्ष द्वितिया से लेकर सप्तमी तिथी तक चलने वाले चार पहिए के रथ को फूलरथ कहा जाता है। इसमें पूजा पाठ से लेकर बलि तक की सभी रस्में निभाई जाती है। बस्तर के गांवों से आए मुरिया और धुरवा जनजाति के लोग इन रथों को खींचते हैं।

पुलिस बलों द्वारा दी जाती है मां दंतेश्वरी को सलामी

बस्तर दशहरा के उत्सव के दौरान रथ को 5 पुलिस बलों के द्वारा हवाई फायरिंग से सलामी भी दी जाती है। बस्तर दशहरा का अंतिम चरण होता है मावली माता की बिदाई समारोह। सभी रस्मों को निभाने के बाद मावली माता को ससम्मान दंतेवाड़ा वापस भेजा जाता है। जिसके साथ ही बस्तर दशहरा खत्म होता है।  बस्तर दशहरा एक ऐसा उत्सव है जिसके तार कई मान्यताओं, दैवीय शक्तियों और रहस्यों से जुड़े हैं। इसे देखकर अनुभव करना एक अलग ही अहसास है। बस्तर की कला संस्कृति, परंपरा, मान्यताएं सबकुछ आपको बस्तर दशहरा में देखने को मिलेगी।

विडियो में देखें बस्तर दशहरा की पूरी कहानी

2024 में 77 दिनों का मनाया जाएगा दशहरा उत्सव

साल 2024 में बस्तर दशहरा 77 दिनों का मनाया जा रहा है। तो अगर आप भी बस्तर दशहरा में शामिल होना चाहते हैं तो नवरात्रि पक्ष में जगदलपुर जरूर पहुंचे। ये सभी रस्में जगदलपुर की दंतेश्वर मंदिर के आस-पास ही निभाई जाती है। यहीं पर राजपरिवार का महल भी है। नवरात्रि से 13 दिनों तक इसका मुख्य आकर्षण दिखाई देता है। राजधानी रायपुर से जगदलपुर पहुंचने के लिए आपको बस मिल जाएगी।

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राज्य सरकार द्वारा पर्यटन और बस्तर की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कई सरकारी होम स्टे और गेस्ट हाउस संचालित किए जा रहे हैं। जहां आप रुक सकते हैं।

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Rishita Diwan

Content Writer

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