खरौद को क्यों कहते हैं छत्तीसगढ़ का काशी, क्या है शिवलिंग का रहस्य?

छत्तीसगढ़ के उत्तर-मध्य में मौजूद है जांजगीर चांपा जिला। मुख्य उत्पादक जिले के रूप में जांजगीर की पहचान तो है ही साथ ही कई ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के स्थल भी यहां मौजूद है। इसी जिले में स्थित है छत्तीसगढ़ का त्रिवेणी संगम शिवरीनारायण और मोक्ष नगरी खरौद, जिसे कहते हैं छत्तीसगढ़ का काशी।

खरौद को क्यों कहते हैं छत्तीसगढ़ का काशी, क्या है शिवलिंग का रहस्य?

पौराणिक मान्यताओं का शहर

जिस तरह काशी में भगवान शिव के अनेकोनेक मंदिर हैं उसी तरह आप खरौद में भी शिव के कई मंदिर देखेंगे। संभवत: यही वजह हो सकती है कि इस जगह का नाम काशी पड़ा हो। लेकिन खरौद के शिव मंदिर का महत्व ही सबसे अलग और प्राचीन है, जिसका नाम है लक्ष्मणेश्वर शिव (Lakshmaneshwar Temple) मंदिर। मंदिर का नाम सुनते ही आपके दिमाग में ये बात जरूर आई होगी कि जब मंदिर भगवान शिव का है तो इसका नाम लक्ष्मणेश्वर मंदिर कैसे पड़ा होगा?

गुप्त तीर्थ के लिए आए थे लक्ष्मण

भगवान राम और लक्ष्मण पर रावण का वध करने की वजह से ब्रह्म हत्या का पाप लगा, क्योंकि रावण एक ब्राह्मण थे ! इस पाप से मुक्ति पाने के लिए श्रीराम और लक्ष्मण ने रामेश्वर लिंग की स्थापना की थी। शिव के अभिषेक के लिए लक्ष्मण जी सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों से जल इकट्ठा करने लगे।

लक्ष्मण ने की थी भगवान शिव की उपासना

इस दौरान लक्ष्मण गुप्त तीर्थ शिवरीनारायण पहुंचे और यहां से जब वो जल लेकर निकलने लगे तो रोगग्रस्त हो गए। रोग से छुटकारा पाने के लिए लक्ष्मण ने शिव की आराधना की। शिवजी ने प्रसन्न होकर लक्ष्मण को दर्शन दिए और खरौद में ही लक्षलिंग रूप में विराजमान हो गए। लक्ष्मण ने विधि-विधान से खरौद में भगवान शिव की पूजा की।

खरदूषण का हुआ था वध

वहीं अगर बात करें कि इस जगह का नाम खरौद कैसे पड़ा तो इसके पीछे भी एक रामायण कालीन कथा प्रचलित है। दरअसल ये क्षेत्र राक्षस खरदूषण का था। भगवान राम ने यहीं पर खरदूषण का वध किया था जिससे इस जगह का नाम खरौद पड़ गया।

पांडुवंश के राजाओं ने करवाया था मंदिर निर्माण

लक्ष्मणेश्वर मंदिर (Lakshmaneshwar Temple) निर्माण की बात करें तो इसका संबंध 6वीं से 7वीं शताब्दी के पांडुवंश से है। दरअसल पांडुवंश के शासक ईशानदेव शिव भक्त थे और इस क्षेत्र में उन्होंने शासन किया। बाद में उन्होंने लक्ष्मण की शिव आराधना की कहानी का अनुशरण करते हुए लक्ष्मणेश्वर  शिव मंदिर का निर्माण करवाया। बाद के कई शैव धर्म के मानने वाले शासकों ने इस धरोहर की देखभाल की और 1000वीं शताब्दी में कल्चुरी वंश के शासक रत्नदेव तृतीय के सेनापति गंगाधर राव ने लक्ष्मणेश्वर मंदिर का जिर्णोद्धार करवाया यानी कि मंदिर को संरक्षित किया। मंदिर में मिले शिलालेख से इस बात की पृष्टि होती है।  

ये भी देखें Birsa Munda: क्यों आदिवासियों के भगवान क्यों कहे जाते हैं धरती-आबा’?

रहस्यमयी है मंदिर

लक्ष्मणेश्वर मंदिर (Lakshmaneshwar Temple) के शिवलिंग में 1 लाख छोटे-छोटे छेद हैं। लोककथाओं में ये प्रचलित है कि शिव के इन छिद्रों में से एक पाताल तक जाता है। वहीं एक ऐसा छिद्र भी है जिसमें सदैव जल भरा रहता है। इसे अक्षय कुंड कहते हैं। शिवलिंग में 1 लाख छोटे छिद्र होने की वजह से इस मंदिर को छत्तीसगढ़ में लाखा-चाउर मंदिर भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि श्रद्धालु इस शिवलिंग पर एक लाख चावल के कण शिव को अर्पित करते हैं। देखिए यूट्यूब पर मंदिर की पूरी कहानी।

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Rishita Diwan

Content Writer

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