Marigold Farming in Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ में कृषि का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। राज्य शासन की किसान हितैषी नीतियों और उद्यानिकी विभाग (Horticulture Department) के तकनीकी मार्गदर्शन ने किसानों के लिए समृद्धि के नए द्वार खोल दिए हैं। अब किसान केवल धान के भरोसे न रहकर फूलों और सब्जियों जैसी नकदी फसलों (Cash Crops) की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव की एक चमकती तस्वीर सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के ग्राम बरगांव में देखने को मिली है, जहां किसान देवानंद निषाद ने ‘गेंदे की खेती’ (Marigold Farming) को अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति में क्रांतिकारी सुधार किया है।
धान बनाम गेंदा
एक तुलनात्मक बदलाव
परंपरागत रूप से, छत्तीसगढ़ के अधिकांश किसान रबी के मौसम में भी धान की खेती को प्राथमिकता देते रहे हैं। बरगांव के देवानंद निषाद भी पहले रबी में धान ही उगाते थे। एक एकड़ में उन्हें लगभग 20 क्विंटल धान प्राप्त होता था, जिसमें लागत और मेहनत के अनुपात में मुनाफा बहुत ही कम था।
देवानंद बताते हैं कि धान की खेती में पानी की खपत अधिक थी और बाजार भाव की अनिश्चितता के कारण शुद्ध लाभ नाममात्र का रह जाता था। यहीं से उन्होंने कुछ नया करने की ठानी और उद्यानिकी विभाग के संपर्क में आए।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन का मिला साथ
वर्ष 2025-26 में देवानंद ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन (National Horticulture Mission) के तहत पुष्प क्षेत्र विस्तार योजना का लाभ उठाया। विभाग ने उन्हें न केवल उन्नत किस्म के गेंदे के पौधे उपलब्ध कराए, बल्कि विशेषज्ञों द्वारा समय-समय पर तकनीकी प्रशिक्षण और मार्गदर्शन भी दिया गया।
उद्यानिकी विभाग की सलाह पर उन्होंने रबी फसल के रूप में गेंदे के फूलों का चयन किया। पिछले दो वर्षों के अनुभव और विभाग की मदद से उन्होंने अपनी खेती के तरीके को पूरी तरह आधुनिक बना लिया, जिसका परिणाम आज सबके सामने है।
लागत कम, मुनाफा बेमिसाल
गेंदे की खेती के गणित को समझें तो यह धान की तुलना में कई गुना अधिक लाभकारी सिद्ध हुई है,
| विवरण | गेंदा खेती (प्रति एकड़) |
| कुल लागत | लगभग 50,000 रुपये |
| कुल उत्पादन | 3,750 किलोग्राम |
| औसत बाजार भाव | 80 रुपये प्रति किलो |
| कुल आय | 3,00,000 रुपये |
| शुद्ध लाभ | 2,50,000 रुपये |
प्रतिदिन देवानंद अपने खेतों से 60 से 70 किलोग्राम ताजे गेंदा फूल तोड़कर पास के रायगढ़ फूल बाजार में बेचते हैं। ₹80 प्रति किलो का औसत भाव उन्हें साल भर एक स्थिर और शानदार आय सुनिश्चित करता है।
आर्थिक सुदृढ़ता और प्रेरणा का स्रोत
इस सफलता ने न केवल देवानंद के परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारा है, बल्कि पूरे बरगांव के किसानों के लिए एक मॉडल पेश किया है। फूलों की खेती से होने वाले ढाई लाख रुपये के शुद्ध मुनाफे को देखकर अब गांव के अन्य किसान भी प्रेरित हो रहे हैं। वे अब समझ चुके हैं कि आधुनिक कृषि तकनीक और सही फसल का चुनाव करके कम जमीन में भी लखपति बना जा सकता है।
छत्तीसगढ़ सरकार की इस तरह की पहल ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी है। गेंदा, गुलाब और अन्य फूलों की बढ़ती मांग ने किसानों के लिए स्थानीय स्तर पर ही रोजगार और लाभ के अवसर पैदा कर दिए हैं।
Positive सार
देवानंद निषाद की कहानी यह साबित करती है कि यदि किसान को सही समय पर सरकारी योजनाओं का लाभ और तकनीकी सलाह मिले, तो वह किसी भी चुनौती को अवसर में बदल सकता है। धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में अब फूलों की महक खुशहाली का नया संदेश बांट रही है।
ये भी देखें

