कृषि के क्षेत्र में जब नवाचार और आधुनिक तकनीक का मेल होता है, तो सफलता के नए रास्ते खुलते हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंबिकापुर (बंगाली चौक) की रहने वाली सुरबिल दास ने इस बात को सच कर दिखाया है।
पारंपरिक खेती से अलग हटकर सुरबिल ने मशरूम उत्पादन को अपने स्वरोजगार का जरिया बनाया। आज वे हर साल 4 टन (4,000 किलो) मशरूम का बंपर उत्पादन कर रही हैं।
उनकी इस सफलता की सबसे बड़ी खासियत उनका जीरो-वेस्ट मॉडल (Zero-Waste Model) है। इसमें खेती के कचरे से लेकर बचे हुए मशरूम तक का शत-प्रतिशत उपयोग किया जाता है। आइए जानते हैं Ambikapur Surbil Das mushroom farming success story के पीछे की तकनीक और उनकी पूरी यात्रा।
दो सीजन में Oyster और Button Mushroom का रिकॉर्ड उत्पादन
सुरबिल दास पूरे साल में मौसम के हिसाब से दो अलग-अलग चक्रों में मशरूम की खेती करती हैं:
- Oyster Mushroom: अनुकूल मौसम आते ही वे सबसे पहले ऑयस्टर मशरूम की फसल लगाती हैं। पिछले सीजन में उन्होंने 2.5 टन ऑयस्टर मशरूम का उत्पादन किया।
- Button Mushroom: इसके बाद वे बटन मशरूम के लिए विशेष कम्पोस्ट तैयार करती हैं। पिछले साल उन्होंने 1.5 टन बटन मशरूम हासिल किया।
- मौजूदा तैयारी: इस साल भी उन्होंने ऑयस्टर मशरूम लगा दिया है। साथ ही, बटन मशरूम उगाने के लिए कम्पोस्ट पूरी तरह तैयार है।
क्या है सुरबिल दास का Zero-Waste Model?
आम तौर पर मशरूम निकालने के बाद उसके अवशेष और पुरानी मिट्टी को फेंक दिया जाता है। हालांकि, सुरबिल ने अपने फार्म पर पर्यावरण के अनुकूल चक्र तैयार किया है।
सुरबिल दास का जीरो-वेस्ट चक्र:
- मशरुम उत्पादन: ऑयस्टर और बटन मशरूम का वैज्ञानिक तरीके से सफल उत्पादन किया जाता है।
- वैल्यू एडिशन: जो मशरूम ताजे नहीं बिक पाते, उनसे अचार, स्वादिष्ट पापड़ और बड़ी का निर्माण किया जाता है।
- मिट्टी का पुनः उपयोग: फसल पूरी होने के बाद बची हुई पुरानी कम्पोस्ट से उच्च गुणवत्ता वाली सुपर ऑर्गेनिक खाद बनाई जाती है।
- शून्य अपशिष्ट: इस पूरी प्रक्रिया में खेती का कोई भी अवशेष बेकार या नष्ट नहीं होता है।
नेशनल ट्रेनर बनकर 500 से अधिक महिलाओं और युवाओं को बनाया आत्मनिर्भर
सुरबिल केवल अपने निजी मुनाफे तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने अपनी विशेषज्ञता को समाज की अन्य महिलाओं और युवाओं के साथ साझा करने का संकल्प लिया।
- 500 से अधिक लोगों को ट्रेनिंग: एक नेशनल मास्टर ट्रेनर के रूप में वे अब तक 500 से अधिक किसानों और महिलाओं को वैज्ञानिक तरीके से मशरूम उगाने की बारीकियां सिखा चुकी हैं।
- कॉलेज में तकनीकी मार्गदर्शन: वर्तमान में वे सिलफिली स्थित महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी कॉलेज में भी मशरूम यूनिट स्थापित करवा रही हैं। वहां वे छात्रों को तकनीकी मार्गदर्शन देती हैं।
नए किसानों के लिए सुरबिल दास के 3 मुख्य टिप्स
जो लोग मशरूम फार्मिंग में अपना करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए सुरबिल कुछ महत्वपूर्ण सुझाव देती हैं:
- तापमान और नमी का नियंत्रण: मशरूम पूरी तरह से इनडोर और नियंत्रित वातावरण की फसल है। इसलिए कमरे का तापमान और नमी (Humidity) सही बनाए रखना सबसे जरूरी है।
- सफाई और जीवाणु रहित माहौल: बैग्स बनाते समय हाथ और कमरे की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें ताकि फंगस और कंटैमिनेशन न फैले।
- प्रोसेसिंग पर ध्यान दें: केवल कच्चा मशरूम बेचने पर निर्भर न रहें। सुखाकर पाउडर, अचार या पापड़ बनाने से फसल की शेल्फ लाइफ बढ़ जाती है।
अंबिकापुर की सुरबिल दास की यह सफलता साबित करती है कि कम जगह और सीमित संसाधनों में भी अगर सही तकनीक और सूझबूझ अपनाई जाए, तो कृषि को एक बेहद लाभदायक व्यवसाय बनाया जा सकता है। उनका जीरो-वेस्ट ऑर्गेनिक मॉडल राज्य के अन्य किसानों के लिए एक बेहतरीन राह दिखाता है।

