सनातन धर्म में रक्षाबंधन का पर्व केवल भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतीक ही नहीं है, बल्कि यह अटूट विश्वास, त्याग और रक्षा के संकल्प का भी त्योहार है। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला यह पावन पर्व अपने भीतर कई पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाएं समेटे हुए है। रक्षाबंधन से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इनमें सबसे भावुक और प्रेरणादायक कथा देवी लक्ष्मी और राजा बलि की मानी जाती है।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा निस्वार्थ भाव, भक्ति और एक रेशम का धागा कैसे भगवान को भी भक्त के वश में कर सकता है। आइए विस्तार से जानते हैं रक्षाबंधन के पीछे की इस अद्भुत और पावन पौराणिक कहानी को।
वामन अवतार और राजा बलि की महानता
पौराणिक कथाओं के अनुसार, दानवीर दैत्यराज बलि बहुत ही शक्तिशाली और धार्मिक राजा थे। उन्होंने अपनी भक्ति और तपस्या के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। राजा बलि की भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर, लेकिन देवराज इंद्र और अन्य देवताओं की चिंता को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने ‘वामन’ (बौने ब्राह्मण) का अवतार लिया।
भगवान वामन, राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे और उनसे दान में केवल ‘तीन पग भूमि’ मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें सचेत किया, लेकिन अपनी बात के पक्के राजा बलि ने वामन देव को तीन पग भूमि देने का वचन दे दिया।
इसके बाद भगवान विष्णु ने अपना विशाल रूप (त्रिविक्रम रूप) धारण किया। उन्होंने एक पग में पूरी पृथ्वी और दूसरे पग में स्वर्ग लोक को नाप लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची, तो परम भक्त राजा बलि ने अपना मस्तक भगवान के चरणों में झुका दिया और कहा— “हे प्रभु! तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।”
भगवान विष्णु का पाताल लोक में द्वारपाल बनना
राजा बलि के इस निस्वार्थ समर्पण और अटूट भक्ति से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बना दिया और उन्हें देवराज इंद्र के समान पद प्रदान किया। इसके साथ ही भगवान ने बलि से वरदान मांगने को कहा।
राजा बलि ने भगवान विष्णु से कहा— “हे प्रभु! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं जब भी देखूं, आप मेरे सामने ही रहें।”
भक्त की इस इच्छा को पूरा करने के लिए भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के महल के द्वारपाल (चौकीदार) बन गए।
वैकुण्ठ में देवी लक्ष्मी की व्याकुलता\
उधर, वैकुण्ठ धाम में धन की देवी लक्ष्मी अपने स्वामी भगवान विष्णु के बिना अकेली हो गईं। अपने पति की अनुपस्थिति से देवी लक्ष्मी अत्यंत दुखी और व्याकुल रहने लगीं। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति के बंधन में बंधकर पाताल लोक में द्वारपाल का कार्य कर रहे हैं, तो उन्होंने अपने स्वामी को वापस वैकुण्ठ लाने का एक उपाय सोचा।
देवी लक्ष्मी ने एक निर्धन ब्राह्मणी का रूप धारण किया और पाताल लोक में राजा बलि के पास पहुंचीं। उन्होंने राजा बलि से कहा कि उनका कोई घर नहीं है और जब तक उनके पति अपना कार्य पूरा करके वापस नहीं लौट आते, तब तक वे महल में आश्रय चाहती हैं। राजा बलि ने एक बड़े भाई की भांति अत्यंत आदर और निस्वार्थ भाव से ब्राह्मणी (लक्ष्मी जी) का स्वागत किया और उन्हें अपने महल में शरण दी।
श्रावण पूर्णिमा का वो ऐतिहासिक दिन
ब्राह्मणी रूपी लक्ष्मी जी के महल में आते ही राजा बलि का संपूर्ण राज्य सुख, समृद्धि और अपार धन-धान्य से भर गया। जब श्रावण मास की पूर्णिमा का पावन दिन आया, तो ब्राह्मणी (देवी लक्ष्मी) ने राजा बलि की कलाई पर एक रंग-बिरंगा सूती धागा (रक्षा सूत्र) बांधा और उनकी दीर्घायु एवं सुरक्षा की कामना की।
राजा बलि इस बहनापे और रक्षा सूत्र के भाव से इतने अभिभूत हो गए कि उन्होंने ब्राह्मणी से कहा— “हे बहन! तुमने मुझे भाई मानकर मेरी कलाई पर यह रक्षा सूत्र बांधा है। बताओ, तुम्हें क्या चाहिए? तुम जो भी मांगोगी, मैं तुम्हें सहर्ष दे दूंगा।”
सत्य का प्रकटीकरण और भगवान विष्णु की मुक्ति
राजा बलि के वचन देते ही ब्राह्मणी ने महल के द्वारपाल (भगवान विष्णु) की ओर इशारा किया और कहा— “मुझे केवल मेरे पति वापस चाहिए, जिन्हें तुमने अपना द्वारपाल बना रखा है।”
यह सुनते ही भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो गए। राजा बलि यह देखकर चकित रह गए कि साक्षात माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु उनके सामने खड़े हैं। राजा बलि, देवी लक्ष्मी के इस असीम स्नेह और भगवान विष्णु के प्रति प्रेम से अत्यंत द्रवित हो उठे। उन्होंने सहर्ष भगवान विष्णु को अपने वचन से मुक्त कर दिया और उन्हें देवी लक्ष्मी के साथ वैकुण्ठ लौटने का निवेदन किया।
हालांकि, भगवान विष्णु भी अपने भक्त का दिल नहीं दुखाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने राजा बलि को आश्वासन दिया कि वे हर साल चातुर्मास (मानसून के चार महीने) के दौरान पाताल लोक में राजा बलि के पास ही निवास करेंगे।
रक्षाबंधन का महत्व और संदेश
इसी पौराणिक घटना के बाद से श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई। देवी लक्ष्मी द्वारा राजा बलि को धागा बांधने की इस घटना ने यह सिद्ध किया कि रक्षा सूत्र केवल कपड़े का एक धागा नहीं है, बल्कि यह प्रेम, रक्षा, कर्तव्य और त्याग का वो बंधन है जो भगवान को भी भक्त के वश में कर लेता है।
आज भी जब बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं, तो पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है, जो इसी कथा की याद दिलाता है:
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”
(अर्थात: जिस रक्षा सूत्र से महाबली दानवेंद्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूँ। हे रक्षा सूत्र! तुम स्थिर रहना, अपने कर्तव्य से कभी मत डिगना।)
रक्षाबंधन का यह पर्व हमें सिखाता है कि रिश्ते केवल खून के नहीं होते, बल्कि भावना और समर्पण के होते हैं। देवी लक्ष्मी और राजा बलि की यह कथा हमें त्याग, दानशीलता और बहन के प्रति भाई के कर्तव्य का बोध कराती है। इस रक्षाबंधन, जब आप अपनी बहन से राखी बंधवाएं या भाई को रक्षा सूत्र बांधें, तो इस पावन पौराणिक कथा के भाव को अपने मन में अवश्य याद रखें।
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