खरीफ सीजन 2026 की शुरुआत से पहले मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देश में वर्षा दीर्घकालिक औसत (एलपीए) के लगभग 90 प्रतिशत रहने की संभावना है। एल-नीनो के प्रभाव के कारण मानसून सामान्य से कमजोर रहने और शुरुआती महीनों में कम बारिश होने के संकेत मिल रहे हैं।
ऐसे में कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान पारंपरिक तरीकों के बजाय वैज्ञानिक खेती की तकनीकों को अपनाएं, तो कम वर्षा की स्थिति में भी धान की अच्छी उपज हासिल की जा सकती है। विशेष रूप से कतार बोनी (लाइन सोइंग) और नैनो डीएपी का उपयोग किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
कतार बोनी: कम पानी में बेहतर फसल का भरोसेमंद तरीका
धान की खेती में सीड ड्रिल के माध्यम से कतार बोनी को कृषि वैज्ञानिक एक प्रभावी तकनीक मानते हैं। इस पद्धति में बीजों की बुवाई निश्चित दूरी और निर्धारित गहराई पर की जाती है, जिससे अंकुरण बेहतर होता है और पौधों का विकास समान रूप से होता है।
कतार बोनी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि पौधों की जड़ें गहराई तक विकसित होती हैं। मजबूत जड़ प्रणाली मिट्टी में उपलब्ध नमी को अधिक प्रभावी ढंग से अवशोषित करती है, जिससे कम बारिश या सूखे जैसी परिस्थितियों में भी फसल को पर्याप्त पोषण मिलता रहता है।
पौधों के बीच कम प्रतिस्पर्धा, अधिक उत्पादन
विशेषज्ञों के अनुसार कतार बोनी से पौधों के बीच उचित दूरी बनी रहती है। इससे प्रत्येक पौधे को पर्याप्त सूर्य प्रकाश, पानी और पोषक तत्व प्राप्त होते हैं। परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि बेहतर होती है और उत्पादन क्षमता में वृद्धि होती है।
इसके अलावा कतारों के बीच निराई-गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण का कार्य भी आसान हो जाता है। खरपतवार कम होने से मिट्टी की नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है, जो कम वर्षा वाले मौसम में फसल के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
नैनो डीएपी से मजबूत होंगी जड़ें, बढ़ेगी पोषक तत्वों की उपलब्धता
कम वर्षा की परिस्थितियों में फसल को पर्याप्त पोषण उपलब्ध कराना भी बड़ी चुनौती होती है। इसी को ध्यान में रखते हुए कृषि विभाग किसानों को नैनो डीएपी के उपयोग के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
नैनो डीएपी में मौजूद फास्फोरस के सूक्ष्म कण पौधों द्वारा आसानी से अवशोषित किए जाते हैं। इससे जड़ों का विकास तेज होता है, पौधों की प्रारंभिक वृद्धि मजबूत होती है और पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ती है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कम नमी की स्थिति में भी नैनो डीएपी पौधों को आवश्यक पोषण उपलब्ध कराने में मदद करता है, जिससे फसल पर प्रतिकूल मौसम का प्रभाव कम पड़ता है।
जल संरक्षण के उपाय भी हैं जरूरी
केवल उन्नत तकनीकों का उपयोग ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि खेत में जल संरक्षण के उपाय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। कृषि विभाग किसानों को मेड़बंदी, खेत तालाब, वर्षा जल संचयन और नमी संरक्षण जैसी तकनीकों को अपनाने की सलाह दे रहा है।
मेड़बंदी से वर्षा का पानी खेत में अधिक समय तक रुकता है और मिट्टी की नमी बनी रहती है। इससे फसल को लंबे समय तक पानी उपलब्ध होता है और सिंचाई पर निर्भरता कम होती है।
नैनो यूरिया और जैव उर्वरकों का संतुलित उपयोग बढ़ाएगा लाभ
विशेषज्ञों के अनुसार नैनो डीएपी के साथ नैनो यूरिया और जैव उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व निरंतर मिलते रहते हैं। इससे उत्पादन लागत कम होती है और किसानों की आय में वृद्धि की संभावना बढ़ती है।
वैज्ञानिक खेती ही भविष्य की जरूरत
बदलते जलवायु परिदृश्य और अनिश्चित मानसून के दौर में कृषि क्षेत्र के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। ऐसे समय में कतार बोनी, नैनो डीएपी, जल संरक्षण और संतुलित उर्वरक प्रबंधन जैसी वैज्ञानिक तकनीकें किसानों के लिए सुरक्षा कवच बन सकती हैं।
कृषि विभाग का मानना है कि यदि किसान खरीफ 2026 में इन आधुनिक तकनीकों को अपनाते हैं, तो कम वर्षा के बावजूद धान उत्पादन को स्थिर रखा जा सकता है और खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।
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