बस्तर में होगी रबर की खेती, केरल की तरह छत्तीसगढ़ में भी रबर की खेती की संभावनाएं!



• इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय और रबर अनुसंधान संस्थान कोट्टायाम के मध्य समझौता
• केरल की तरह बस्तर बनेगा रबर की खेती का केंद्र
• रबर की खेती से मुनाफा कमाएंगे किसान

छत्तीसगढ़ का बस्तर कई संभावनाओं से परिपूर्ण है, जहां एक तरफ प्राकृतिक खूबसूरती, पर्यटन, आदिवासी संस्कृति के लिए बस्तर का नाम जाना जाता है वहीं यहां कि कृषि अनुकूल जलवायु भी हर किसी को हैरान कर देती है। कुछ साल पहले ही बस्तर में सफलतापूर्वक कॉफी की खेती की गई तो अब बस्तर रबर की खेती के लिए तैयार हो रहा है। जिसके लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर व रबर अनुसंधान संस्थान कोट्टायाम के बीच अनुबंध किया गया है।

बस्तर में रबर की खेती की संभावनाएं

बस्तर के आदिवासी किसान अब रबर की खेती कर ज्यादा मुनाफा कमाएंगे। इसके लिए रबर अनुसंधान संस्थान, कोट्टायाम बस्तर क्षेत्र में रबर की खेती की संभावनाएं तलाशने कृषि अनुसंधान केन्द्र बस्तर में एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में रबर की प्रायोगिक खेती करने जा रहा है। इसके लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल की मौजूदगी में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर तथा रबर अनुसंधान संस्थान कोट्टायाम के मध्य एक समझौता साइन किया गया।

एक हेक्टेयर रकबे में होगी रबर की खेती

इस समझौते के अनुसार रबर इंस्टिट्यूट कृषि अनुसंधान केन्द्र बस्तर में एक हेक्टेयर रकबे में रबर की खेती के लिए सात वर्षों की अवधि के लिए पौध सामग्री, खाद – उर्वरक, दवाएं व मजदूरी पर होने वाला व्यय इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय को उपलब्ध कराएगा। वह रबर की खेती के लिए सभी जरूरी तकनीकी मार्गदर्शन के साथ रबर निकालने की तकनीक भी उपलब्ध कराएगा। पौध प्रबंधन का कार्य रबर इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किया जाएगा।

महत्वपूर्ण है रबर की खेती

रबर एक अधिक लाभ देने वाली फसल है। भारत में केरल, तमिलनाडु आदि दक्षिणी राज्यों में रबर की खेती ने किसानों को सम्पन्न बनाने में अहम भूमिका निभाई है। प्राकृतिक रबड़ बहुत ही खास होता है लेकिन काफी मुश्किल पदार्थ भी। इससे टायर बनाने से लेकर जूते के सोल, इंजन की सील, रेफ्रिजरेटर से लेकर बहुत से इलेक्ट्रिक उपकरणों, कॉडम, कपड़ों समेत गेंद से लेकर इलास्टिक बैंड्स तक बनाने में इसका इस्तेमाल होता है। कोविड-19 महामारी के दौरान इसी से पीपीई किट का निर्माण भी किया गया जो दुनियाभर के डॉक्ट रों और नर्सो के लिए किसी कवच से कम नहीं था।

रबर की खेती के लिए उपयुक्त है बस्तर की जलवायु

रबर अनुसंधान संस्थान कोट्टायाम के वैज्ञानिकों ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की मिट्टी, आबोहवा, भू-पारिस्थितिकी आदि को रबर की खेती के लिए उपयुक्त पाया है और प्रायोगिक तौर पर एक हेक्टेयर क्षेत्र में रबर के पौधों का रोपण किया जा रहा है।

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Dr. Kirti Sisodia

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