Thirumangai Alvar Statue: ऑक्सफोर्ड लौटा रहा प्राचीन कांस्य मूर्ति!

500 साल पुरानी संत थिरुमंगई अलवर की मूर्ति लौटेगी भारत

ऑक्सफोर्ड म्यूजियम का बड़ा फैसला

Thirumangai Alvar Statue: ब्रिटेन की प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी स्थित ऐशमोलियन म्यूजियम (Ashmolean Museum) ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए 16वीं सदी की दुर्लभ कांस्य मूर्ति भारत को वापस करने की घोषणा की है। यह प्रतिमा दक्षिण भारत के प्रसिद्ध वैष्णव संत थिरुमंगई अलवर (Thirumangai Alvar) की है। लगभग 500 साल पुरानी इस कलाकृति को तमिलनाडु के एक मंदिर से ले जाया गया था, जो अब दशकों बाद अपनी मातृभूमि वापस लौट रही है।

कौन थे संत थिरुमंगई अलवर?

संत थिरुमंगई अलवर दक्षिण भारत के 12 वैष्णव अलवर संतों में अंतिम और अत्यंत प्रभावशाली माने जाते हैं। 8वीं सदी के इस महान भक्त का मूल नाम ‘कलियान’ था। आध्यात्मिक मार्ग अपनाने से पहले वे एक कुशल सैन्य कमांडर थे, लेकिन भगवान विष्णु की भक्ति ने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया।

वे एक प्रखर कवि भी थे। उन्होंने ‘दिव्य प्रबंधम’ (4000 भक्ति स्तोत्रों का संग्रह) में छह महत्वपूर्ण रचनाओं का योगदान दिया। इतिहासकारों के अनुसार, तमिलनाडु के प्रसिद्ध श्रीरंगम मंदिर के निर्माण और विस्तार में उनकी भूमिका अतुलनीय रही है। वापस आने वाली यह कांस्य प्रतिमा लगभग 57 से 60 सेंटीमीटर ऊँची है, जो उनकी भक्ति और उस काल की कलात्मक श्रेष्ठता का प्रतीक है।

चोरी से नीलामी तक का सफर

यह सवाल उठना लाजिमी है कि यह मूर्ति सात समंदर पार कैसे पहुँची? रिकॉर्ड्स के अनुसार, ऐशमोलियन म्यूजियम ने इस प्रतिमा को 1967 में प्रसिद्ध नीलामी संस्था सूथेबी (Sotheby’s) के माध्यम से खरीदा था। इसे निजी संग्राहक डॉ. जे. आर. बेलमोंट से प्राप्त किया गया था। उस समय संग्रहालय का दावा था कि उन्होंने इसे ‘सद्भावना’ (Good Faith) में खरीदा था और इसके चोरी होने की कोई जानकारी उनके पास नहीं थी।

कैसे खुला मूर्ति की असली पहचान का राज?

इस मूर्ति की वापसी की कहानी किसी जासूसी उपन्यास से कम नहीं है। साल 2019 में एक फ्रांसीसी शोधकर्ता ने पुडुचेरी स्थित ‘फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पोंडिचेरी’ के अभिलेखागार में 1957 की एक पुरानी तस्वीर देखी। इस तस्वीर में वही प्रतिमा तमिलनाडु के साउंडरराजा पेरुमल मंदिर में स्थापित दिखाई दी।

इस खुलासे के बाद हड़कंप मच गया। जांच में पता चला कि मंदिर में जो मूर्ति वर्तमान में रखी है, वह एक आधुनिक प्रतिकृति (Replica) है और मूल मूर्ति दशकों पहले बदली जा चुकी थी। इसके बाद इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट (India Pride Project) के एस. विजयकुमार और भारतीय अधिकारियों ने पुख्ता सबूत जुटाए। मार्च 2020 में लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने औपचारिक रूप से इस पर अपना दावा पेश किया।

सांस्कृतिक कूटनीति की बड़ी जीत

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने एथिकल कलेक्शन प्रैक्टिस (Ethical Collection Practice) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए मूर्ति वापसी की प्रक्रिया शुरू की। संग्रहालय के निदेशक डॉ. क्सा स्टुर्गिस ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के सहयोग की सराहना की है। यह केवल एक धातु की मूर्ति की वापसी नहीं है, बल्कि भारत की उस सांस्कृतिक विरासत की वापसी है जिसे औपनिवेशिक काल या अवैध तस्करी के जरिए विदेशों में पहुँचा दिया गया था।

इससे पहले 2022 में भी ग्लासगो म्यूजियम ने भारत को 7 ऐतिहासिक कलाकृतियां लौटाई थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कदम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के सांस्कृतिक प्रभाव और ‘सॉफ्ट पावर’ को और मजबूती प्रदान करते हैं।

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Rishita Diwan

Content Writer

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