Ansuni Gaatha: क्या आप जानते हैं, घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और कल-कल बहती रिहन्द नदी के आंचल में एक ऐसा साम्राज्य छिपा था, जिसकी नींव एक “राखी” के कर्ज और दो भाइयों के बलिदान पर रखी गई थी? और यही साम्राज्य छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ों में से एक गढ़ भी था, आज की अनसुनी गाथा में कहानी एक ऐसे रियासत की जो छत्तीसगढ़ ही नहीं भारत के इतिहास में भी अमर है।
Ansuni Gaatha
छत्तीसगढ़ के उत्तर में बसा है ‘कोरिया’ जिला…जो आज भले ही अपनी कोयला खदानों और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए मशहूर हो, लेकिन इसकी मिट्टी में दफन है बलेंद राजाओं का वैभव, कोल राजाओं का संघर्ष और मैनपुरी के चौहान राजपूतों का अदम्य साहस। आज हम समय के पहिए को पीछे घुमाएंगे और उस दौर में चलेंगे जहां सत्ता पहाड़ियों से बदलती थी और राजाओं का भाग्य युद्ध के मैदानों में लिखा जाता था।
बलेंद और कोल राजाओं का वर्चस्व
इतिहास के पन्नों को पलटें तो एडवर्ड डाल्टन के अनुसार, इस भूमि पर सबसे प्राचीन और पहला इतिहास ‘बलेंद’ राजाओं का था। उनकी शक्ति का केंद्र सीधी में था, लेकिन उनका प्रभाव कोरिया की पहाड़ियों तक फैला था। आज भी कुदेरगढ़ की चोटियों पर स्थित मां महामाया का मंदिर उनकी आस्था की गवाही देता है। लेकिन सत्ता कभी एक हाथ में नहीं रहती। समय बीता और कोल राजाओं ने गोंड जमींदारों के साथ मिलकर एक शक्तिशाली मोर्चा बनाया और बलेंदों को यहाँ से खदेड़ दिया।
कोरियागढ़ के पहाड़ हैं गवाह
कहते हैं कि कोल शासकों ने यहां 11 पीढ़ियों तक राज किया। कोरियागढ़ के पहाड़ पर आज भी वो खंडहर मौजूद हैं, जहां कभी कोल राजाओं की राजधानी हुआ करती थी। लोग बताते हैं कि वहां एक रहस्यमयी बावली और मिट्टी के टीले आज भी उन पुराने दिनों की याद दिलाते हैं।
लेकिन कोरिया की कहानी में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब 17वीं सदी में मैनपुरी के दो चौहान राजकुमार दलथंबन साही और धारामल साही जगन्नाथ पुरी की तीर्थ यात्रा से लौट रहे थे। वे सरगुजा की राजधानी विश्रामपुर में ठहरे हुए थे, तभी उन्हें पता चला कि सरगुजा के महाराजा की अनुपस्थिति में कुछ बागी सरदारों ने राजमहल को घेर लिया है। संकट की इस घड़ी में रानी ने चौहान भाइयों को पारंपरिक “राखी” भेजी। राखी के धागों ने उन योद्धाओं को ऐसा बांधा कि उन्होंने अपनी छोटी सी सैन्य टुकड़ी के साथ बागियों पर हमला कर दिया और उन्हें खदेड़ दिया।
भैयाथान नाम कैसे पड़ा
इस उपकार के बदले महाराजा ने उन्हें ‘भैया’ का खिताब दिया और झिलमिली की जागीर भेंट की। यही कारण है कि आज उस क्षेत्र को ‘भैयाथान’ कहा जाता है। लेकिन छोटे भाई धारामल साही की किस्मत उन्हें और आगे ले गई। उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति जुटाई और कोल राजाओं को हराकर कोरिया राज्य पर अपना अधिकार कर लिया। उन्होंने ‘नगर’ को अपनी पहली राजधानी बनाया और इस तरह कोरिया में चौहान वंश के शासन की शुरुआत हुई।
मराठों का आक्रमण
वक्त का थपेड़ा फिर लगा और 18वीं सदी में कोरिया को मराठों के भीषण आक्रमणों का सामना करना पड़ा। 1765 में भोसले की सेनाओं ने आक्रमण किया और राजा गरीब सिंह को ‘चौथ’ यानी कि कर देने पर मजबूर कर दिया। मराठों के डर से राजधानी को बार-बार बदलना पड़ा नगर से रजौरी और फिर दुर्गम पहाड़ियों के बीच सोनहत।
1797 में मराठा सूबेदार गुलाब खान ने अपनी पैदल सेना और अश्वारोहियों के साथ सोनहत को तहस-नहस कर दिया। लेकिन कोरिया के वीरों ने हार नहीं मानी। पटना के जमींदार की मदद से उन्होंने मराठों को वापस भागने पर मजबूर किया और युद्ध में उनकी तलवारें और नगाड़े छीन लिए।
ईस्ट इंडिया कंपनी का दौर
1819 में जब नागपुर के भोसले हार गए, तो कोरिया रियासत ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में आ गई। उस समय सालाना कर मात्र 400 रुपये तय किया गया था। शासन की बागडोर धीरे-धीरे स्थिर हुई। हालांकि राजा अमोल सिंह के समय सत्ता की असली शक्ति उनकी पत्नी रानी कदम कुंवर के हाथों में रही, लेकिन असल बदलाव तब आया जब 1899 में राजा शिवोमंगल सिंह देव गद्दी पर बैठे। उन्होंने दूरदर्शिता दिखाते हुए 1900 में राजधानी को सोनहत से हटाकर ‘बैकुंठपुर’ स्थानांतरित कर दिया, क्योंकि बैकुंठपुर राज्य के केंद्र में था और यहाँ से प्रशासन चलाना आसान था।
और यहीं पर शुरू हुआ कोरिया का स्वर्ण युग जब राजा रामानुज प्रताप सिंह देव के शासन में कोरिया के इतिहास का सबसे चमकता अध्याय 1925 में शुरू हुआ…
कोरिया का स्वर्ण काल
राजा रामानुज प्रताप सिंह देव ने पूर्ण सत्ता संभाली। वे केवल एक राजा नहीं, बल्कि एक आधुनिक दूरदर्शी थे। उन्होंने लंदन के गोलमेज सम्मेलन में रियासतों का प्रतिनिधित्व किया। उनके शासनकाल में कोरिया की आय 2.25 लाख से बढ़कर 44 लाख रुपये हो गई। उन्होंने चिरमिरी की कोयला खदानें शुरू करवाईं, बिजुरी-चिरमिरी रेलवे लाइन बिछवाई और रामानुज हाई स्कूल जैसे संस्थानों की नींव रखी। वे इतने ईमानदार और सख्त प्रशासक थे कि उनके समय में भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं था। 15 दिसंबर 1947 को उन्होंने भारत संघ में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर किए और 1 जनवरी 1948 को कोरिया औपचारिक रूप से स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन गया।
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