Mainpat Tourism: आपने भारत के पड़ोसी देश तिब्बत के बारे में तो जरूर सुना होगा। लेकिन क्या आप कभी वहां गए हैं? इस सवाल का जवाब बेशक ना होगा। क्योंकि पर वहां पर चीन का कब्जा हो चुका है।
ऐसे में अगर आपसे ये कहा जाए कि एक ऐसी जगह है जहां पर तिब्बत के लोगों को भारत ने शरण दी है। और आज इन जगहों पर बस चुके हैं मिनी तिब्बत जहां आपको तिब्बत के लोग, तिब्बती खान-पान, पहनावा और रहन-सहन सबकुछ देखने को मिलेगा।
भारत ने दी थी शरण
चीन ने 1950 के दशक के आस-पास तिब्बत पर कब्जा कर लिया। चीन ने तिब्बत की भाषा, संस्कृति और धर्म को निशाना बनाया जिससे वहां के लोग अपनी पहचान खोने लगे। साल 1959 आते-आते चीनी दमन के खिलाफ़ तिब्बत में विद्रोह हुआ, जिसे चीन ने बेरहमी से कुचल दिया। इसके बाद, आध्यात्मिक नेता दलाई लामा अपने हजारों अनुयायियों के साथ भारत की तरफ शरण लेने के लिए मजबूर हो गए।
और 1962 के भारत-चीन युद्ध ने इस पलायन को और तेज कर दिया, क्योंकि चीन ने भारतीय इलाकों पर कब्ज़ा करने की कोशिश की और तिब्बत का भविष्य गहराता गया।
भारत ने इन तिब्बती शरणर्थियों को शरण तो दे दी लेकिन अब एक कठिन समस्या थी कि इन्हें बसाया कहां जाए। इतनी बड़ी संख्या में आए तिब्बती शरणार्थियों को बसने के लिए उनके अनुकूल मौसम और जलवायु चाहिए थी।
तब केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ के मैनपाट का चयन किया। तब छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा था। मध्यप्रदेश सरकार ने मैनपाट का चयन किया जो अपनी ठंडी जलवायु के कारण जानी जाती है। तत्कालिन राज्य सरकार ने 3000 एकड़ भूमि आवंटित की जो तिब्बती क्षेत्रों जैसी थी और मैनपाट की फेंडेलिंग तिब्बती बस्ती 1962 में पहली स्थापित बस्ती बनी।
समुद्र तल से करीब 3781 फीट की ऊंचाई पर स्थित मैनपाट की ठंडी हवाओं ने इन शरणार्थियों को गले लगा लिया। आज यहां लगभग 2300 तिब्बती परिवार रहते हैं, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से इस अनजान पहाड़ को अपना दूसरा घर बना लिया।
बौद्ध मंदिर धाकपो मठ
जब आप मैनपाट की गलियों में घूमते हैं, तो यहां की संस्कृति आपको हैरान कर देगी। यहां का ‘धाकपो मठ’ शांति का एक ऐसा केंद्र है, जहां की दीवारों पर बनी पेंटिंग्स और बुद्ध की विशाल मूर्तियां आपको सीधे ल्हासा की याद दिलाएंगी। तिब्बती लोग अपने साथ सिर्फ यादें नहीं लाए थे, वे लाए थे अपनी परंपराएं। यहां के घरों के बाहर लगे रंगीन ‘प्रेयर फ्लैग्स’ यानी कि प्रार्थना ध्वज के बारे में कहा जाता है कि जब हवा इनसे टकराती है, तो शांति और सुख का आशीर्वाद पूरे वातावरण में फैल जाता है। दलाई लामा का दो बार यहां आना इस जगह की आध्यात्मिक अहमियत को और पुख्ता कर देता है।
लेकिन मैनपाट सिर्फ मंदिरों के लिए नहीं जाना जाता। अगर आप सितंबर-अक्टूबर के महीने में यहां आएं, तो आपकी नजरें जहां तक जाएंगी, आपको बर्फ जैसी सफेद चादर दिखेगी। ये बर्फ नहीं, बल्कि ‘टाऊ’ के फूलों की खेती है। टाऊ, जिसे फाफर या कुट्टू भी कहते हैं, तिब्बत की मुख्य फसल है। तिब्बती शरणार्थी अपने साथ इसके बीज लाए थे। आज यह फसल मैनपाट की पहचान बन चुकी है। मजेदार बात ये है कि अब यहां के आदिवासी और स्थानीय किसान भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। इस टाऊ के आटे का इस्तेमाल व्रत के खाने और सेहतमंद दलिया बनाने में होता है, जिसकी डिमांड अब विदेशों तक पहुंच गई है।
मैनपाट को ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ भी कहते हैं क्योंकि यहां का तापमान अक्सर राज्य के बाकी हिस्सों से बहुत कम रहता है। यहां ‘उल्टा पानी’ जैसी रहस्यमयी जगह है, जहां पानी ढलान के बजाय ऊपर की ओर बहता है और गाड़ियां न्यूट्रल गियर में भी अपने आप पहाड़ की ओर खिंची चली जाती हैं। यह किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। इसके अलावा, यहां के घने जंगलों के बीच छिपे झरने और ‘टाइगर पॉइंट’ जैसे नज़ारे इस सफर को रोमांचक बना देते हैं
खान-पान की बात करें तो यहां आपको असली तिब्बती जायका मिलेगा। थुकपा, मोमोज और यहां की खास चाय का स्वाद लेकर आप भूल जाएंगे कि आप मध्य भारत में हैं। तिब्बती समुदाय के लोग ऊनी कपड़ों के कारोबार और भेड़ पालन में भी माहिर हैं, जो उनकी आत्मनिर्भरता की कहानी कहता है। यहां की आबोहवा में एक खास तरह का सुकून है, जो स्थानीय आदिवासियों और तिब्बती प्रवासियों के बीच के आपसी तालमेल से और गहरा हो जाता है।

