Travel: प्राकृतिक नजारों से भरपूर है कोंकण रेलवे, दो दिन के सफर में देख सकते हैं प्रकृति का खूबसूरत नजारा


प्रकृति से परिपूर्ण भारत के कई क्षेत्र पर्यटन के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। इनमें से एक है कोंकण रेलवे। यह एक ऐसा रेलवे रूट है, जो आजाद भारत में लगा था। अनगिनत चुनौतियों के बावजूद भी इसे भारतीय इंजीनियरों ने अपने कौशल से पूरा किया था। आज यह केवल ट्रांसपोर्ट का एक रूट नहीं, बल्कि एक अच्छा टूरिस्ट स्पॉट भी है।

खूबसूरत नज़ारे

भारत का पश्चिमी तट अरब सागर से लगा हुआ है। इसी के समानांतर पहाड़ों की एक शृंखला गुजरात से केरल तक जाती है। इसे पश्चिमी घाट कहते हैं। लेकिन अरब सागर व पश्चिमी घाट के ऊंचे पहाड़ों के बीच में एक मैदानी भाग स्थित है, जो बहुत संकरा लेकिन काफी लंबा है और दक्षिणी गुजरात से केरल तक फैला हुआ है।

महाराष्ट्र, गोवा व कर्नाटक में इस संकरी मैदानी पट्टी को कोंकण के नाम से जानते हैं। इसमें मैदानी भाग के साथ-साथ कटा-फटा समुद्र तट, पहाड़ों से आती नदियां और छोटी-छोटी पहाड़ियां शामिल है। इस क्षेत्र में बारिश बहुत ज्यादा होती है और यह सदाबहार जंगलों से भी घिरा हुआ है।

अंग्रेजों के समय विकसित हुआ था यहां का कुछ भाग

इस भाग में अंग्रेजों की बिछाई कुछ रेलवे लाइनें हैं,

जैसे मुंबई रेल नेटवर्क, मुंबई-भुसावल व मुंबई-पुणे लाइन, हुबली-मडगांव-वास्को लाइन और हासन-मंगलौर लाइंस। इनमें वास्को लाइन व मंगलौर लाइन मीटर गेज के रूप में थीं और मुख्यतः गोवा के वास्को डि गामा बंदरगाह और कर्नाटक के मंगलौर बंदरगाह से माल ट्रांसपोर्ट के लिए उपयोग की जाती थी।

1990 के दशक में मुंबई को मंगलौर से जोड़ने के लिए एक रेल लाइन बिछाने की शुरूआत हुई। जिसका उद्देश्य कोंकण के तटीय इलाकों को बेहतर कनेक्टिविटी देने के साथ-साथ माल ढोना भी था। इसके लिए बड़ी-बड़ी सुरंगें और लंबे-लंबे पुल बने।

26 जनवरी 1998 को मुंबई और मंगलौर आपस में रेलमार्ग से जुड़े। आज यह रेलमार्ग भारत के साथ-साथ दुनिया के सबसे खूबसूरत रेलमार्गों में शामिल है।

यहां की हरियाली, एक तरफ समुद्र और दूसरी तरफ पश्चिमी घाट के ऊंचे-ऊंचे पर्वत इसकी खूबसूरती को बढ़ाते हैं। ट्रेन जब किसी मोड़ पर घूमती है, तो वह नजारा काफी अट्रैक्टिव होता है।

आधिकारिक रूप से मुंबई से 120 किमी दूर रोहा स्टेशन से कोंकण रेलवे की शुरुआत होती है। लेकिन एक आम यात्री के लिए पनवेल से ही कोंकण रेलवे शुरू होती है। ट्रेन जब पनवेल से चलनी शुरू करती है, तो कभी खत्म न होने वाले बेहद खूबसूरत रेलवे मार्ग से गुजरती है और यात्रियों की नजरें खिड़की से बाहर देखती रहती हैं। पनवेल से मंगलौर की दूरी करीब 1,100 किमी तक की है और इसे तय करने में 15 से 18 घंटे लगते हैं। ट्रेन घने जंगलों से तो होकर गुजरती ही है, साथ ही कई बार जलप्रपातों के नीचे से भी जाती है। इनमें उक्शी रेलवे स्टेशन तो आधा सुरंग के अंदर है और बाकी आधा जलप्रपात के नीचे तक है।

कैसे शुरू करें यात्रा?

कोंकण रूट देखने के लिए कम से कम 2 दिन ऐसे लेकर चलना होगा, जिसमें पूरा दिन दिन ट्रेन में ही गुजरे। सुबह मुंबई से चलने वाली किसी ट्रेन में बैठकर शाम तक मडगांव पहुंचना होगा। इस मार्ग में लंबी-लंबी सुरंगें मिलेंगी। जनशताब्दी, तेजस और मांडवी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें सही हैं। ये सभी ट्रेनें मुंबई से सुबह चलती हैं और शाम तक मडगांव में होती हैं। इनमें जनशताब्दी व तेजस में बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाले विस्टाडोम कोच भी हैं, जिनसे कोंकण की खूबसूरती को देखा जा 
सकता है।

वैसे तो कोंकण रेलमार्ग पर कभी भी यात्रा की जा सकती है, लेकिन मानसून सबसे अच्छा होता है। यह रेलवे लाइन महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक के कई पर्यटन, धार्मिक, सांस्कृतिक व औद्योगिक स्थानों को आपस में जोड़ती है, जिनमें चिपलूण, रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, मडगांव, कारवाड़, गोकर्ण, मुरुडेश्वर, उडुपि शामिल हैं।

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Dr. Kirti Sisodia

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