सुपर-30 टीचर्स: छत्तीसगढ़ में शिक्षकों की टीम उठा रही है लड़कियों की शिक्षा का जिम्मा!

Highlights:

  • सरकारी कॉलेज में 30 टीचर्स मिलकर हर साल सुपर 30 गर्ल्स स्टूडेंट्स की टीम तैयार करते हैं।
  • प्रत्येक प्रोफेसर कम से कम दो बेटियों की शिक्षा के लिए भुगतान करते है।
  • अब तक करीब 1000 से अधिक गरीब बच्चियों को उच्च शिक्षा दिलाने में मिल चुकी है मदद।

सुपर-30 के लीड गणितज्ञ आनंद कुमार के बारे में तो सब ने सुना होगा, जिन्होंने देश के कई बच्चों को नई पहचान दी है। लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में सुपर-30 की एक अलग ही कहानी है। दुर्ग के एक शासकीय कॉलेज में 30 टीचर्स मिलकर हर साल सुपर 30 गर्ल्स स्टूडेंट्स की टीम तैयार करते हैं। यह सुपर 30 टीचर्स उन वंचित और गरीब बच्चियों की मदद करते हैं जिन्हें आर्थिक परेशानियों की वजह से अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते हैं।

क्या है सुपर-30 टीचर्स ?

छत्तीसगढ़ के शासकीय वामन राव पाटणकर गर्ल्स कॉलेज में 30 टीचर्स मिलकर हर साल सुपर 30 गर्ल्स स्टूडेंट्स की टीम तैयार करते हैं। इन टीचर्स ने खुद स्वयं साल 2020 में कॉलेज की स्टूडेंट्स के लिए ‘मोर नोनी’ योजना चलाई है। अपने इस नेक कान से इन शिक्षकों ने अब तक करीब 1000 से अधिक गरीब बच्चियों को उच्च शिक्षा दिलाने में मदद की है।

शिक्षा की अलख जगा रही सुपर 30 टीचर्स

शासकीय वामन राव पाटणकर गर्ल्स कॉलेज में हर साल लगभग 3700 से ज्यादा बेटियां अपना नाम एनरोल कराती हैं। इनमें शहर ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों की गरीब घरों की बच्चियां भी शामिल होती हैं। कॉलेज में कई छात्राएं ऐसी भी हैं जो आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती हैं और बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। कॉलेज के 30 प्रोफेसर्स ने मिलकर ऐसी एक-एक बेटी को अपनी बेटी की तरह पढ़ाने की जिम्मेदारी ली है।

कैसे हुई योजना की शुरूआत?

कोरोना संक्रमण काल के दौरान कई बच्चियों को अपनी पढ़ाई बीच में ही रोकनी पड़ी। अचानक से छात्रों में इतनी गिरावट देख कर कॉलेज के सभी प्रोफेसर काफी चिंतित हो गए। उन्होंने एक बैठक बुलाई और इस बात को समझा कि आखिर इतनी अधिक संख्या में बेटियां कॉलेज क्यों छोड़ रही हैं।

जिसके बाद यह सामने आया की सामान्य वर्ग की बेटियां जो महाविद्यालय की फीस और अन्य खर्च नहीं उठा पा रही हैं, कॉलेज छोड़ने को मजबूर हो रही हैं। इस वजह से उनके अभिभावक उन्हें कॉलेज नहीं भेज रहे हैं। बस फिर क्या था प्रोफेसर ने तत्काल निर्णय लिया कि अब कोई भी बेटी शिक्षा से दूर नहीं होगी। बच्चियों को शिक्षित करने के लिए सभी प्रोफेसर मिल कर सामने आए।

‘मोर नोनी’ योजना

कॉलेज के प्राचार्य डॉ. सुशील चंद्र तिवारी ने कहा कि कॉलेज के 30 प्रोफेसर मिलकर गरीब बेटियों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाते हैं। सभी प्रोफेसर्स ने मिलकर ‘मोर नोनी’ योजना की शुरूआत की है। ‘मोर नोनी’ का मतलब होता है ‘मेरी बेटी’। मोर नोनी प्रणाली में Super 30 Teachers के हर एक प्रोफेसर कम से कम दो बेटियों की शिक्षा के लिए भुगतान करते है। इतना ही नहीं, प्रोफेसर के बच्चे भी अब इस योजना से जुड़ गए हैं और सहयोग कर रहे है।

एक साल में एक बेटी पर 3, 000 का खर्च

लड़कियों को आज भी पढ़ाई पूरी करने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। आर्थिक स्थिति के कारण बहुत-सी जगहों में स्कूल के बाद उनकी पढ़ाई छुड़वा दी जाती है। कॉलेज लेक्चरर ऋचा ठाकुर ने बताया कि जब भी उनकी संस्था को कॉलेज में गरीब छात्राओं के बारे में पता चलता है तो वे उन बेटियों से संपर्क करते हैं।

इसके बाद इन बेटियों के घरवालों से बातचीत कर उन्हें समझाया जाता है। जब परिवार उसकी शिक्षा को बाधित नहीं करने के लिए सहमत हो जाते है, तो कोई भी एक प्रोफेसर या सहायक प्रोफेसर बच्ची की जिम्मेदारी लेता है। जिम्मेदारी लेने वाला प्रोफेसर फीस और स्टेशनरी सहित बालिकाओं के लिए सभी जरूरतों की व्यवस्था करता है। एक साल में एक बच्ची की पढ़ाई पर फीस समेत करीब 3-4 हजार का खर्च आता है।

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Dr. Kirti Sisodia

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