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आर्थिक आजादी को लेकर बढ़ रही है समझ, फाइनेंशियल एजुकेशन को लेकर जागरूक हुए हैं भारतीय

by Rishita Diwan

Date & Time: Nov 23, 2022 3:00 PM

Read Time: 2 minute



पिछले 10 सालों में भारत ने कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। जिनमें से एक अर्थव्यवस्था का भी क्षेत्र है। आज देश फाइनेंशियल एजुकेशन की तरफ़ बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में जितने भी लोग निवेश करते हैं, एफ़डी यानी फ़िक्स डिपॉजिट करने वालों से ज़्यादा संख्या म्यूचुअल फंड में पैसा लगाने वालों की है। जबकि म्यूचुअल फंड के निवेश में काफी रिस्क होता है। इसका मतलब यह निकलता है कि लोगों में फाइनेंशियल जागरूकता बढ़ी है और वे समझदारी के साथ रिस्क ले रहे हैं।

रिपोर्ट्स की मानें तो कुल निवेशकों में से म्यूचुअल फंड या एसआईपी चला रहे लोगों का प्रतिशत 57 है, जबकि एफ़डी करने वाले 54 प्रतिशत ही लोग हैं। ऐसा भी हो सकता है कि एफ़डी करने वाले और एसआईपी चलाने वाले लोगों में रिपीटेशन भी होगा लेकिन यह आँकड़ा फाइनेंशियल जागरूकता के लिए बहुत ही अच्छा है। इसकी सबसे बड़ी बात यह है कि सर्वे रिपोर्ट के अनुसार एसआईपी चलाने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज़्यादा है।

रिपोर्ट्स की मानें तो एसआईपी चलाने वालों में महिलाएँ 60% और पुरुष 55% हैं। जो आर्थिक आज़ादी का यह अच्छा इंडीकेटर है।

पूर्व प्रधानमंत्री ने रखी थी आर्थिक आजादी की नींव

भारतीयों में आर्थिक आजादी की समझ बढ़ाने की नींव पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के द्वारा रखी गई। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने देश को उबारने का जो काम किया वह वाकई काबिले तारिफ है। भारत 1947 में आज़ाद हुआ लेकिन देश के लोगों को आर्थिक आज़ादी 1991 में मिली जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी। तब लोगों को बैंक के बारे में न तो कुछ पता था न ही वे बैंक में अपना पैसा रखना चाहते थे। लोगों के मन में यह धारणा थी कि बैंक से लोन कभी नहीं लेना चाहिए। ऐसा भी माना जाता था कि बैंकें ब्याज पर ब्याज लेती हैं। लेकिन वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह के किए गए कार्यों से भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। आज के युवा आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ ही आर्थिक आजादी के महत्व को भी समझते हैं।

मुद्रा की तरलता को बढ़ाने और पैसे की आसान उपलब्धि का श्रेय केवल मनमोहन सिंह को जाता है। एक जमाना था जब लोन मंज़ूर करने के लिए बैंक मैनेजर रिश्वत लिया करते थे। कम से कम पाँच या दस परसेंट तो देना ही होता था। इसके बिना कुछ भी संभव नहीं था। आज हालात ऐसे हैं कि लोन के लिए केवल एक फ़ोन घुमाइए शाम तक बैंक एग्जीक्यूटिव आपके घर या ऑफिस आकर सारी फॉर्मेलिटीज पूरी कर लेते हैं और एक या दो दिन में लोन मिल भी जाता है।

वैसे तो लोन देने के लिए अलग- अलग बैंकों के निवेदन फ़ोन पर आते रहते हैं। कहते हैं कोई काग़ज़- पत्री नहीं करनी है। आप तो बस लोन ले लीजिए। जबकि अब तो लोन की ब्याज दर भी तब से लगभग आधी हो चुकी है। बल्कि आधे से भी कम।

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