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EDITORIAL COLUMN

होली: नया रूप

by Dr. Kirti Sisodia

Read Time: 2 minute


त्यौहार भारतीय संस्कृति का अटूट हिस्सा है। त्यौहार न सिर्फ, मेल-मिलाप और खुशी मनाने का ज़रिया है बल्कि हमें जीवन की शिक्षा का पाठ भी पढ़ाते हैं। होली फाल्गुन माह में मनाई जाती है। जो बसंत ऋतु का आगमन का उत्सव कहा जा सकता है। बसंत एक ऋतु नहीं बल्कि एक मन है, हर एक मन का अपन-अपना बसंत है। मन में उमंग है तो हर ऋतु बसंत बन जाती है। और हर मन की अपनी उमंग होती है। यही कारण है कि हर एक ऋतु में प्रकृति की भी अलग उमंग होती है।

शरद में शाखाओं की, ग्रीष्म में फलों की, वर्षा में पत्तों की, बसंत में फूलों की और हेमंत में जड़ों की। परिवर्तनशील रहना हमें प्रकृति भी सिखाती है। मानव अपने व्यवहार, स्वभाव और आदतों में भी समय के साथ बदलाव करता रहता है। जो कि ज़रूरी भी है। हम अपने बच्चों को बचपन से अच्छी दैनिक और नैतिक आदतों का पाठ सिखाते हैं। जैसे- समय पर सोना, उठना, पढ़ाई करना, खाना, साफ-सफाई, अच्छे आचार और आचरण को धारण करना। लेकिन अब समय की ज़रूरत के हिसाब से और भी कई आदतें है जो पहले तो हमें समझनी है। और अपनी आने वाली पीढ़ी में सिंचित करनी है।

कोविड काल ने ऑक्सीजन और पेड़ों की महत्ता को समझा दी, लेकिन पानी की निरंतर होती कमी से जो संपूर्ण विश्व में संकट गहरा रहा है, उस पर ध्यान लाना शायद अभी भी बाकी है। नीति आयोग की रिपोर्ट कहती है कि अभी पृथ्वी पर 400 करोड़ लोगों के लिए पानी बचा है जिसमें 100 करोड़ तो भारत में ही खर्च होता है। 2030 तक शायद यह नौबत आ जाए कि पानी भी राशन की दुकानों में मिलने लगेगा।

अब समय आ गया है कि हम सचेत हो जाएं कि पानी की बर्बादी किसी भी तकरीर से सहीं साबित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। होली रंगों का त्यौहार है, रंगों में सराबोर होने का असली का मतलब है- प्यार, भाईचारे और करुणा में डूबना। न कि कीचड़ और पक्के रंगों से हुड़दंग मचाना और फिर उन रंगों को छुड़ाने में ढ़ेर सारा पानी बर्बाद करना।

होली पर एक गुलाल का तिलक या गालों का स्पर्श ही इस उत्सव में जान डालने को काफी है।

होली के असली अर्थ को समझें, औरों को भी समझाएं ।

होली त्यौहार ही सबकों अपने प्राकृतिक प्रेम के रंग में रंग जाने का संदेश देता है। समाज के साथ व्यक्ति एकाकार हो जाता है। बसंत प्रकृति के माध्यम से समूचे मन को एक साथ रंगता है।
उसकी एक आशा भी रहती है कि हम मन को रंगे, केवल मन और कपड़ों को नहीं।

कबीरदास जी ने इसीलिए कहा भी है- “मन न रंगाएं, रंगाई जोगी कपड़ा”

इस मौसम में हम अपने मन को सुर्ख, पीत, श्वेत, गुलाबी, धानी आदि न सिर्फ रंगे बल्कि उनके अर्थ को भी मन से जोड़ें, और पानी की बर्बादी रोकें।

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