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अनसुनी गाथा

'पृथ्वीराज रासो' के महाकवि, चंदबरदाई की कहानी

by admin

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'चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान', इस प्रमुख काव्य की रचना कवि चंदबरदाई ने की हैं। बरदाई, भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के राजकवि, मित्र, तथा सलाहकार थे। दरबारी कवि के रूप में, चंदबरदाई अपने संरक्षक की प्रशंसा में कविताएं और गाथागीत लिखा करते थे। बरदाई की कविताएं ऐतिहासिक घटना पर आधारित होती हैं।

ज्ञान से परिपूर्ण बरदाई

चंदबरदाई का जन्म 30 सितंबर, 1149 को हुआ था। बरदाई सरस्वती देवी के बहुत बड़े भक्त थे। उन्होंने संस्कृत व्याकरण, साहित्य, ज्योतिष, छंद और पुराणों में महारत हासिल की थी। वह हिन्दी की विभिन्न बोलियां बोल सकते थे जैसे-अभिरी, औटकली, चांडाली, द्रविड़िणी, शकरी, स्वाली और विजयिया। उन्हें हथियार चलाने के लिए प्रशिक्षित भी किया गया था। युद्ध के दौरान वह हमेशा सेना के साथ रहा करते थे और सैन्य अभियास भी किया करते थे।

बरदाई का प्रसिद्ध ग्रंथ

चंदबरदाई के प्रसिद्ध ग्रंथो में से एक 'पृथ्वीराज रासो' है। भाषा-शास्त्रियों ने इसकी भाषा को पिंगल कहा है। पिंगल राजस्थान में ब्रजभाषा का पर्याय है। इसलिए चंदवरदाई को ब्रजभाषा हिन्दी का प्रथम महाकवि माना जाता है। 'रासो' कविता में महाराजा पृथ्वीराज के युद्ध का वर्णन किया गया है। साथ हीं इसमें बरदाई ने पृथ्वीराज के जीवन के युद्ध और प्रेम कथा के बारे में भी बताया हैं। इस ग्रंथ में लगभग 100, 000 श्लोक थे। अभी उपलब्ध इस ग्रंथ के लगभग 30, 000 श्लोकों का कर्नल टॉड द्वारा अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है।
बरदाई का व्यक्तिगत जीवन

कवि चंदबरदाई की दो बार शादी हुई थी। उनकी पत्नियों का नाम कमला और गौरन था। बरदाई के 10 पुत्र थे-सूर, सुंदर, सुजान, जाल्हान, वल्लाह, बलभद्र, केहरी, वीर चंद, अवदुत और गुनराज और एक पुत्री थी, राजाबाई।

तराइन का युद्ध

चंदबरदाई न केवल दरबारी कवि थे बल्कि राजा के खास लोगों में से भी एक थे। कवि युद्धों के दौरान राजा के साथ जाया करते थे। 1192 ई. में तराइन की दूसरी लड़ाई में, पृथ्वीराज हार गए थे, जिसके बाद मोहम्मद गौरी ने कब्जा कर लिया था। इस विषम परिस्थिति में भी चंदबरदाई उनके साथ खड़े थे।

पृथ्वीराजरासो में ऐसा लिखा गया है कि, इस युद्ध के बाद मोहम्मद गौरी के दरबार में पृथ्वीराज को अंधा कर दिया गया था। जिसके बाद चंदबरदाई चतुराई से अपनी काव्य 'चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान’ के माध्यम से पृथ्वीराज को, मोहम्मद गौरी की दिशा और स्थीति बताई। जिसकी मदद से महाराजा पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को बांण से मार गिराया था। इससे पहले कि अंगरक्षक, राजा और चंद बरदाई को मार सकते, वह दोनों ने एक दूसरे को खंजर की मदद से मार डाला था।
जन्म से मृत्यु तक रहा साथ माना जाता है की, जन्म से मृत्यु तक का सफर चंद बरदाई और सम्राट पृथ्वीराज ने साथ ही तय किया था। दोनों ने जन्म भी एक ही दिन लिया था और इस दुनिया में दोनों की विदाई भी एक ही दिन हुई थी। हर जगह दोनों साथ ही नज़र आया करते थे। महाराज चाहे घर में हों, युद्ध में हों या यात्रा में, चंद जी हमेशा उनके साथ रहते थे और चर्चा में बने रहते थे।

चंदबरदाई ने बिना युद्ध के मैदान में लड़े, अपनी कविताओं के माध्यम से बहुत से युद्धों में पृथ्वीराज चौहान को जीत हासिल करवाई थी। साथ हीं बरदाई ने हमेशा अपने सम्राज्य व राजा के प्रति अपने कर्तव्यों को समर्पित भाव से पूर्ण किया। बरदाई की यहीं बाते उन्हें और उनके काव्य को जग मे अमर करती हैं।


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