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GUEST COLUMN

अवसाद को अंदर से और कोरोना को बाहर से हराएगा हमारा योग

Mr. soman bohra

11 min Read

मानव जीवन अमूल्य है और मानव देह दुर्लभ। इस कारण हमारा धर्म भी है और कर्तव्य भी कि हम इस जीवन, इस देह की रक्षा करें। भारतीय शास्त्रीय परंपरा में न केवल देह की बल्कि अंर्तमन की, आत्मा की शुद्धि और उसकी शक्ति की बात कही गई है। न सिर्फ कही गई है, बल्कि इसके प्रमाण भी दिए हैं। इनके कई साधनों में एक निर्विवाद साधन रहा है योग। गणित की भाषा में योग का अर्थ है जोड़। जब हम स्वयं को स्वयं की विकृतियों के विरुद्ध जोड़ने लगते हैं, तो इसके लिए योग की आवश्यकता पड़ती है। यह विकृतियां आंतरिक भी हो सकती हैं और बाह्य भी। इनके विरुद्ध विजय का ब्रम्हास्त्र योग है। आज पूरा विश्व इस बात को स्वीकार करता है। 

हालिया दिनों में हम दो चुनौतियों को स्पष्ट रूप से देख रहे हैं। पहला अवसाद ग्रस्त जीवन, जिसमें मनुष्य की लालसाएं, कामनाएं, आवश्यकताएं अति की ओर अग्रसर होकर इतनी उग्र हो जाती है, कि इनके अभाव में मनुष्य जीवन में विचारों से संतुलन नहीं बिठा पाता। वो जीवन की जटिलताओं में उलझता जाता है और अंतत: नकारात्मक विचारों की तरफ बढ़ जाता है। ऐसे उदाहरण पिछले कुछ दिनों में देखने को मिले हैं। दूसरी चुनौती है कोरोना से निपटने की चुनौती, ये बाह्य चुनौती है, जिसे योग के द्वारा पराजित करने की शक्ति हासिल की जा सकती है। हमने अब तक जितनी भी रिपोर्ट्स, स्टडीज़, रिसर्च देखे हैं, उनमें एक बात स्पष्ट रूप से देखने में आ रही है, कि यदि आपका इम्यून सिस्टम अच्छा रहेगा, तो कोरोना से उतना खतरा नहीं है और योग में इम्यून सिस्टम को अच्छा करने के लिए प्राणायाम जैसे सरल आसनों से लेकर अन्य कई क्रियाएं बताई गई हैं। कहने का अर्थ है एक संपूर्ण व्यक्तित्व के लिए योग जैसी औषधि हमारे पूर्वजों ने हमें भेंट की है, लेकिन जरूरत है इसे पहचानने की, इसे अपनाने की। 

यदि समग्रता से देखा जाए, तो योग ही वह मार्ग है, जो स्थिरप्रज्ञ होने की दिशा में हमें आगे बढ़ाता है। भगवत गीता में श्री कृष्ण ने स्थिरप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण के संदर्भ में विस्तार से विवरण दिया है। स्थिरप्रज्ञ व्यक्ति वह है जो मनोरथ से उत्पन्न होने वाली इंद्रिय तृप्ति के बजाय मन और आत्मा में संतोष का अनुभव करता है, लेकिन इसमें भी वह कर्म को नहीं छोड़ता। यह विलक्षण गुण है, लेकिन योग के जरिए व्यक्ति स्थिरप्रज्ञ भी हो सकता है। यानी वह दुख-सुख, लाभ-हानि जैसे तत्वों से दूर एक सा भाव अपने मन में रखता है और कर्म करता है। ऐसी अलौकिक और दिव्य अवस्थाओं को ही प्राप्त करने के लिए हमारे शास्त्रीय योग विद्या को कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग और अष्टांग योग में विभाजित किया गया था। ये वही साधन हैं, जो अचेतन, अधीर, असंतुलित मन को स्थिरता प्रदान करते हैं।

योग भारतीय संस्कृति का समानांतर दर्पण है। जब से भारत की सभ्यता मानी जाती है, वेदों और पुराणों में तब से योग की महिमा गाई गई है। योग मात्र कोई शारीरिक गतिविधि नहीं है। यह एक ऐसी शक्ति है जो कई असाध्य रोगों को जड़ से ख़त्म करने की क्षमता रखते हैं और जिसकी वैज्ञानिक पुष्टि भी हो चुकी है। यह दावा नहीं किया जा सकता है कि योग सबकुछ ठीक कर सकता है, लेकिन मनुष्य को मानसिक रूप से मजबूत करने का काम योग ने किया है। इसी कारण आज योग की महिमा पूरा विश्व गा रहा है और इसमें योग गुरु बाबा रामदेव और हमारे प्रधानमंत्री जी का सबसे अहम योगदान है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस यानी पूरे विश्व का ध्यान उस शक्ति की ओर जिसने इसकी महत्ता विश्व पटल पर प्रतिपादित की। भारत योग गुरु था, है, रहेगा, लेकिन इसे जाहिर करने वाला कोई नहीं था। 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की। पूरा विश्व आज इसकी तैयारी में लगा हुआ है। इस दिवस को मनाने से पहले हमें इस बात पर गौर जरूर करना चाहिए कि यूएन जैसी संस्था ने आखिर कैसे विश्व का ध्यान भारत के कहने पर योग के लिए आकर्षित किया और 21 जून को ही क्यों चुना गया? पहली बार अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया था। इससे पहले 27 सितंबर 2014 प्रधानमंत्री जी का संयुक्त राष्ट्र संघ में वो भाषण हुआ था, जिसने पूरी दुनिया के लिए योग की भूमिका तैयार की। उन्होंने अपने भाषण में कहा था-

“योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है। यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है। मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है। विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आयें एक अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं।”

27 सितंबर 2014 को उन्होंने अपनी बात दुनिया को कही थी और इसके तीन महीने के भीतर ही 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों में से 175 देशों ने बिना किसी वोटिंग के 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यह भारत के लिए गौरव का क्षण था क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया था, जो अब तक संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है और इसका अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे देशों ने खुलकर स्वागत किया था। यूएन ने योग की महत्ता को स्वीकारते हुए माना कि ‘ योग मानव स्वास्थ्य व कल्याण की दिशा में एक संपूर्ण नज़रिया है।’ इसके बाद 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस माना गया। जब दुनिया को भारत ने अंतरराष्ट्रीय दिवस देने की पहल की तो यह भारत का, हमारा, आपका नैतिक कर्तव्य और दायित्व बन जाता है कि हम इस दिशा में वो काम करके दिखाएं, जो दुनिया के लिए मिसाल हो और इसी क्रम में हमारे छत्तीसगढ़ समेत पूरे भारत में योग दिवस मनाने की तैयारी चल रही है।

अब दूसरा सवाल कि 21 जून ही क्यों चुना गया। 21 जून को ही अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस बनाए जाने के पीछे की वजह है कि इस दिन ग्रीष्म संक्रांति होती है। यानी इस दिन सूर्य धरती की दृष्टि से उत्तर से दक्षिण की ओर चलना शुरू करता है। यानी सूर्य जो अब तक उत्तरी गोलार्ध के सामने था, अब दक्षिणी गोलार्ध की तरफ बढ़ना शुरू होता है। योग के नज़रिए से यह समय संक्रमण काल होता है, यानी रूपांतरण के लिए बेहतर समय होता है। यह सबसे लंबा दिन होता है।

सद्गुरु जी के अनुसार, ग्रीष्म संक्राति ( ग्रीष्मकालीन अयनांत ) के दिन अपने ध्यान से उठने के बाद आदियोगी दक्षिण की ओर घूमे, जहां उनकी सबसे पहली नजर सप्तऋषियों पर पड़ी। ये सात ऋषि उनके पहले सात शिष्य थे, जिन्होंने योग के विज्ञान को दुनिया के हर कोने में पहुंचाया। यह बेहद खुशी की बात है कि 21 जून मानवता के इतिहास में उस महान घटना का प्रतीक बन गया। योगिक कथाओं के अनुसार योग का पहला प्रसार शिव द्वारा उनके सात शिष्यों के बीच किया गया। कहते हैं कि इन सप्त ऋ षियों को ग्रीष्म संक्राति के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के दिन योग की दीक्षा दी गई थी, जिसे शिव के अवतरण के तौर पर भी मनाते हैं। इस दौर को दक्षिणायन के नाम से भी जाना जाता है। इस दौरान आध्यात्मिक साधना करने वाले लोगों को प्रकृति की तरफ से स्वत: सहयोग मिलता है।’ यही वजह है कि 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। 

वास्तव में योग करने से पहले इस बात की भी जानकारी होना जरूरी है कि योग है क्या? भारत में इसे एक आध्यात्मिक प्रक्रिया के तौर पर देखा जाता है, जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाया जाता है। यानी तीनों का योग कराया जाता है। योग शब्द की उत्पत्ति ही युज शब्द से हुई है, जिसका मतलब है जोड़ना। इसका एक और अर्थ भी है और वो है समाधि। समाधि मतलब चित्त वृत्तियों का निरोध करना। अर्थात योग के द्वारा हम पहले स्वयं से जुड़ें, तत्पश्चात समाधि तक पहुंचे और इसके जरिए परमात्मा से मिलन हो। श्री कृष्ण ने भी गीता में कहा है- “योग: कर्मसु कौशलम्” अर्थात योग से कर्मों में कुशलता आती है। योग की उच्च अवस्था समाधि होती है, जो मोक्ष या कैवल्य तक पहुँचाती है। कैवल्य का अर्थ जैन धर्म के मुताबिक ज्ञान प्राप्ति होता है।

स्वामी विवेकानंद का सपना था- भारत विश्व योग गुरु बने

जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने दुनिया को योग का रास्ता दिखाया तो दुनिया उनके पीछे दौड़ पड़ी। लेकिन 1893 में पश्चिमी दुनिया का योग से परिचय कराया स्वामी विवेकानंद जी ने। अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद को संबोधित करते हुए उन्होंने भारत के पूर्व के कई गुरुओं व योगियों के योग का महत्व बताया। उन्होंने दुनियाभर में योग का प्रसार किया और दुनिया ने योग को बड़े पैमाने पर स्वीकार किया। विश्व योग दिवस की घोषणा के बाद तो आज विश्व स्तर के कई नेता, अभिनेता, मॉडल्स, खेल से जुड़ी हस्तियां योग को बढ़ावा देने के लिए प्रचार प्रसार कर रही हैं। हमारे प्रधानमंत्री स्वयं बेहद कम उम्र से योग का अभ्यास करते आ रहे हैं और उनकी ऊर्जा से हम भलिभांति परिचित हैं ही।  

क्या फायदे हैं योग के?

हम मनुष्य किसी चीज़ की ओर तभी आकर्षित होते हैं, जब उनसे हमें लाभ मिलता है। जिस तरह से योग के प्रति हम लोग आकर्षित हो रहे हैं, वह इस बात का संकेत हैं कि योग के कई फायदे हैं। योग को न केवल हमारे शरीर को बल्कि मन और आत्मिक बल को सुदृढ़ और संतुष्टि प्रदान करता है। दैनिक जीवन में भी योग के कई फायदे हैं।

तनाव से मुक्ति

आज पूरा विश्व जिस सबसे भयंकर बीमारी से ग्रसित है, वह है डिप्रेशन और पूरे विश्व में मानक के तौर पर इसका इलाज बनकर उभरा है योग। यह प्रमाणित तथ्य है कि योग मुद्रा, ध्यान और योग में श्वसन की विशेष क्रियाओं द्वारा तनाव से राहत मिलती है। योग मन को विभिन्न विषयों से हटाकर स्थिरता प्रदान करता है और कार्य विशेष में मन को स्थिर करने में सहायक होता है।

सकारात्मक विचार

जीवन में सकारात्मक विचारों का होना बहुत जरूरी है। निराशाजनक विचार असफलता की ओर ले जाता है। योग से मन में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। योग से आत्मिक बल मिलता है और मन से चिंता, विरोधाभास एवं निराशा की भावना दूर होती है। मन में प्रसन्नता एवं उत्साह का संचार होता है। इसका सीधा असर व्यक्तित्व एवं सेहत पर होता है।

मानसिक क्षमताओं का विकास

इसके अलावा मानसिक क्षमताओं का विकास होता है।  स्मरण शक्ति एवं बौद्धिक क्षमता जीवन में प्रगति के लिए प्रमुख साधन माने जाते हैं। योग से मानसिक क्षमताओं का विकास होता है और स्मरण शक्ति पर भी गुणात्मक प्रभाव होता है। योग मुद्रा और ध्यान मन को एकाग्र करने में सहायक होता है। एकाग्र मन से स्मरण शक्ति का विकास होता है। प्रतियोगिता परीक्षाओं में तार्किक क्षमताओं पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं। योग तर्क शक्ति का भी विकास करता है एवं कौशल को बढ़ता है। योग की क्रियाओं द्वारा तार्किक शक्ति एवं कार्य कुशलता में गुणात्मक प्रभाव होने से आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

मजबूत शरीर

इतना ही नहीं, योग से शरीर मजबूत और लचीला होता है। योग मांसपेशियों को सुगठित और शरीर को संतुलित रखता है। सुगठित और संतुलित और लोचदार शरीर होने से कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है। कुछ योग मुद्राओं से शरीर की हड्डियाँ भी पुष्ट और मजबूत होती हैं। यह अस्थि सम्बन्धी रोग की संभावनाओं को भी कम करता है।

सेहत और योग

योग शरीर को सेहतमंद बनाए रखता है और कई प्रकार की शारीरिक और मानसिक परेशानियों को दूर करता है। योग श्वसन क्रियाओं को सुचारु बनाता है। योग के दौरान गहरी सांस लेने से शरीर तनाव मुक्त होता है। योग से रक्त संचार भी सुचारु होता है और शरीर से हानिकारक टॉक्सिन निकल आते हैं। यह थकान, सिरदर्द, जोड़ों के दर्द से राहत दिलाता है एवं ब्लड प्रेशर को सामान्य बनाए रखने में भी सहायक होता हैं।

इन सब कारणों से सभी के लिए आवश्यक है कि सुबह सुबह रोजाना योग किया जाए और अपने शरीर को स्वस्थ रखा जाए। शरीर के दृष्टिकोण से सद्गुरु (सद्‌गुरु) जी ने एक स्थान पर कहा है-

“हमारे शरीर को दो तरह के रोग होते हैं; एक तो बाहरी इंफेक्शन से जिसे इंफैक्शियस कहा जाता है और दूसरा क्रॉनिक डिजीस, यानी जो हमारे भीतर ही उत्पन्न होता है। 30 प्रतिशत बीमारियाँ बाहरी तत्वों के कारण होती हैं, जिसके लिए बाहरी इलाज अर्थात डॉक्टर के पास जाना ही पड़ता है, लेकिन 70 फीसदी बीमारियाँ हमारे आंतरिक कारणों से होती हैं, जिनका इलाज अंतर्मन को ताक़तवर बनाकर किया जा सकता है और ये योग के द्वारा संभव है। यदि लोग रोजाना थोड़ा सा अभ्यास करें और अपने शरीर के सिस्टम को योग के द्वारा सक्रिय रखें, तो 70 फीसदी क्रॉनिक डिजीज से मुक्ति हो सकती है।”

योग के सुदर्शन क्रिया की महत्ता श्री श्री रविशंकर जी  ने प्रतिपादित की। उन्होंने भी योग के महत्व को अपने कथन में प्रतिपादित किया है। उन्होंने कहा है :

“योग आकस्मिक तरीके से लोगों के जीवन को बदल सकता है। यह हृदय को नरम करता है, बुद्धि को तेज करता है और भ्रम को साफ करता है। इस शताब्दी में, जब अवसाद दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है, तो योग निस्संदेह सर्वश्रेष्ठ ऐप है जिसे हर किसी को अपने जीवन में डाउनलोड करना होगा। ”

विश्व योग दिवस के उद्देश्य

इन्हीं सब बातों के मद्देनज़र विश्व योग दिवस के उद्देश्यों को बनाया गया।

  • योग के फ़ायदों के बारे में लोगों को बताना।
  • योग अभ्यास के द्वारा लोगों को प्रकृति से जोड़ना।
  • योग के द्वारा ध्यान की आदत को लोगों में बनाना।
  • योग के समग्र फायदो की तरफ विश्व का ध्यान खींचना।
  • विश्व में बीमारियों की दर घटाना।
  • स्वास्थ्य के लिए समय निकालकर समुदायों को करीब लाना। 
  • वृद्धि, विकास और शांति को पूरे विश्व भर में फैलाना। 
  • बुरी परिस्थिति में लोगों की मदद करना, तनाव से राहत दिलाना।
  • वैश्विक समन्वय को मजबूत करना।  

इसे हम योग के लिए वैश्विक लोगो के जरिए भी समझ सकते हैं। आप इसे ध्यान से देखिएगा। लोगो में दोनों हाथों का तह करना योग, समूह का प्रतीक है जो व्यक्ति के समूह को प्रतिबिंबित करता है। सार्वभौमिक चेतना के साथ चेतना, मन और शरीर, मनुष्य और प्रकृति के बीच एक परिपूर्ण सामंजस्य, स्वास्थ्य और कल्याण के लिए एक समग्र दृष्टिकोण। भूरे रंग के पत्तों ने पृथ्वी के तत्व का प्रतीक रखा है। हरी पत्तियां प्रकृति का प्रतीक है। नीले पानी के तत्व का प्रतीक है। चमक अग्नि तत्व का प्रतीक है और सूर्य ऊर्जा और प्रेरणा के स्रोत का प्रतीक है। लोगो मानवता के लिए सामंजस्य और शांति को दर्शाता है, जो योग का सार है।

आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि विश्व योग दिवस पर भारत को विश्व गुरु बनाने की दिशा में हम सब एक होकर इस तरह आगे बढ़ेंगे, कि हमारे स्वरों की ध्वनि पूरे विश्व में गूंजायमान होगी। हमारे योग की ऊर्जा से विश्व में बंधुत्व, स्नेह और परिवार की भावना को बल मिलेगा। जिस वसुधैव कुटुंबकम की परिकल्पना हमारे शास्त्रों ने हजारों साल पहले की थी, उसके साकार रूप को गढ़ने में हमारी छोटी छोटी कोशिशें बहुत बड़ी भूमिका अदा करेंगी। 

आज पूरा विश्व कोरोना जैसे गंभीर वायरस से जूझ रहा है। वास्तव में कोरोना को करुणा से ही रोका जा सकता है। करुणा का भाव मन में लाने के लिए मन को संवेदना से भरना होगा, संवेदना के लिए एकाग्रता की आवश्यकता है और एकाग्रता योग से मिलेगी। कहा भी जाता है न, कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। और इसी मन को मजबूत और स्वस्थ करने के लिए योग जरूरी है। पूरा विश्व इसे स्वीकार कर चुका है, लेकिन भारत में अभी भी लोग योग के प्रति जागरूक नहीं हैं। इसकी वैज्ञानिकता भी सिद्ध हो चुकी है, लेकिन भारत के लोगों को इसे घर-घर तक पहुंचाने की पहल बाकी है। तो हमें संकल्प लेना चाहिए कि  विश्व में कल्याण की भावना से योग दिवस से हम योग को आत्मसात करें और इस भारतीय दर्शन, तत्व और क्रिया का लाभ पूरे विश्व तक पहुंचाएं।

(सोनमणि बोरा वरिष्ठ आई.ए.एस हैं। संप्रति राज्यपाल के सचिव और श्रम विभाग के सचिव हैं)


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