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अनसुनी गाथा

देश धर्म पर मिटने वाला, शेर शिवा का छावा था,महा पराक्रमी, परम प्रतापी, एक ही शंभू राजा था।

by admin

3 min Read

ज जो आज़ादी की जिंदगी हम जी रहें हैं, यह ना जाने कितने वीर सपूतों के बलिदान की देन है। लेकिन इतिहास में ना जाने कितने वीरों की कहानियां है जो धुंधली सी हैं। हमे यह अंदाज़ा ही नहीं है कि उनके आज के बदौलत, हमारा आज बेहतरीन हैं।  कहा जाता है कि इतिहास सदा विजेता द्वारा ही लिखा जाता है। कुछ ऐसी ही शूरता की कहानी है, महान राजा एवं रणनीतिकार, छत्रपती शिवाजी महाराज के सबसे बड़े पुत्र की, जिसने मराठा साम्राज्य का इतिहास ही बदल डाला, वीर संभाजी राजे भोंसले।

छत्रपति शिवाजी महाराज और साईबाई के सबसे बड़े पुत्र, संभाजी का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदरगढ़ में हुआ। 2 वर्ष की आयु में ही संभाजी के सिर से माँ का साया उठ गया। उन्हें उनकी दादी, जीजाबाई ने पाला। बहुत ही कम उम्र में संभाजी को शस्त्र एवं शास्त्र का भरपूर ज्ञान था। जब संभाजी 10 वर्ष के थे, तब से उनके पिताजी उन्हें महाराजा आमेर के पास राजनीतिक गठबंधन सीखने के लिए भेजा करते थे। जब संभाजी 23 वर्ष के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया। शीघ्र ही संभाजी ने मराठा साम्राज्य को संभाला एवं नौ वर्षों तक शासन किया।

संभाजी एकमात्र भारतीय योद्धा थे जिन्होंने 9 वर्षों में 120 लड़ाई लड़ी और हर लड़ाई में जीत हासिल की। 16 साल की उम्र में रामनगर का पहला युद्ध जीता। उज्जैन के “कवी कलश” को संभाजी ने अपना सलाहकार बनाया, जो अपनी कविताओं के माध्यम से उनके विचार-धारा को तैयार किया करते थे।

मराठा राज्य की रक्षा के लिए, संभाजी ने मुग़ल सेना के खिलाफ कई युद्ध लड़े। संभाजी ने औरंगाबाद के किले पर भी आक्रमण किया। औरंगाबाद की इस बड़ी लूट और हार ने औरंगज़ेब को हैरान कर दिया। औरंगज़ेब ने सोचा भी न था की 23 साल के बच्चे से उन्हें हार प्राप्त होगी। इसी वजह से औरंगज़ेब  ने अपने सेनापति हुसैन अली खान को संभाजी को मारने का आदेश दिया, परन्तु वे असफल रहे।

हार के बाद, औरंगज़ेब ने रणनीति बनाई और मराठा राज्य को चारों तरफ से घेरने का फैसला लिया। जब युद्ध हुआ तो मुग़लों के 8 लाख की सेना को मराठाओं के 20,000 सैनिकों ने नष्ट कर दिया। संभाजी 9 साल तक मुग़लों को घुमाते रहे और इतने में भारत में मुग़लों के खिलाफ लड़ने के लिए फिर से स्वदेशी ताकतें खड़े होने लगी ।

एक दिन जब संभाजी एक बैठक के लिए संगमेश्वर जा रहे थे, तब उन्ही के एक रिश्तेदार ने मुग़लों को गुप्त रास्ते की जानकारी दी। जैसे ही मुग़ल सेनापति मुकर्रब ख़ान को इसकी सूचना मिली, उसने संभाजी को बंदी बनाने की योजना बनाई। 1689 में जब संभाजी और कवि कलश गुप्त रास्ते से संगमेश्वर जा रहे थे, तो वहां उन पर घात लगा कर हमला किया गया और उन्हें औरंगज़ेब के पास ले जाया गया।

औरंगज़ेब के सामने जब संभाजी को लाया गया तो उन्होंने संभाजी के सामने 3 शर्तें रखी और बदले में जानबख्शी करने का वादा किया। शर्तें यह थी कि:

  • सारे किले औरंगज़ेब को सौंप दिए जाए,
  • संभाजी इस्लाम धर्म कबूल करें, और
  • सारे मुग़ल गद्दारों के नाम बताएं।

संभाजी ने सारे प्रस्तावों को मानने से साफ़ इंकार कर दिया।

40 दिन मुग़लों के काल कोठरी में कैद होने से बावजूद भी संभाजी औरंगज़ेब के सामने झुके नहीं। उन्हें मौत मंजूर थी परंतु राज्य सौंपना एवं धर्म परिवर्तन नहीं।

कहते हैं कि मारने के पहले औरंगज़ेब ने संभाजी राजे से कहा था कि "अगर मेरे चार बेटों में से एक भी तुम्हारे जैसा होता, तो सारा हिंदुस्तान कब का मुग़ल सल्तनत में समा चुका होता”। 

संभाजी की शहादत के बाद सारे मराठी एक हो गए और साथ मिलकर मुग़लों के खिलाफ लड़ते रहे। मराठाओं की सेना में हर महिला शामिल हुई, और हर पत्ता तीर बनता गया। इसी जज़्बे से मराठाओं ने मुग़लों से जीत प्राप्त की और औरंगज़ेब का दक्कन (Deccan) पर कब्ज़ा करने का सपना मरते दम तक पूरा नहीं होने दिया। 

मौत डरी थी देख कर उसे, ये खुद मौत का दावा है।

धरती को नाज़ था उसपर, ऐसा शेर शिवा का छावा है।।


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